देशभर के पर्यावरण और आदिवासी संगठनों का समर्थन बुंदेलखंड (मध्य भारत) की आदिवासी महिलाओं और किसानों का असाधारण ‘चिता आंदोलन’ कुछ समय स्थगित रहने के बाद 3 जुलाई 2026 को फिर से शुरू हो गया है — मध्य प्रदेश के…
निजीकरण नहीं, जनस्वास्थ्य को सशक्त बनाने की जरूरत: स्वास्थ्य एवं जन संगठनों की संयुक्त मांग भोपाल, 6 जुलाई । मध्य प्रदेश सरकार द्वारा रीवा, देवास एवं गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने की प्रस्तावित…
भोपाल, 3 जुलाई। वर्ष 2026 के लोकजतन सम्मान से वरिष्ठ सम्पादक राजेन्द्र शर्मा (नई दिल्ली) को अभिनन्दित किया जाएगा l राजेंद्र शर्मा लगभग आधी सदी से पत्रकारिता में हैं । 1979 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के साथ…
भोपाल, 1 जुलाई। गांधी भवन भोपाल में एसआईआर, जनगणना एवं परिसीमन पर आयोजित बैठक में प्रख्यात चिंतक एवं भाषाविद् गणेश देवी ने कहा कि आगामी जनगणना और उसके बाद प्रस्तावित परिसीमन देश के सामाजिक, भाषाई और राजनीतिक भविष्य पर व्यापक…
पुणे/दिल्ली, 2 जुलाई । पुणे के प्रतिष्ठित संस्थान ‘शंकर ब्रह्मे समाज विज्ञान ग्रंथालय’ ने वर्ष 2026 के लिए अपनी विशेष रिसर्च एवं बुक-राइटिंग फेलोशिप की घोषणा की है। इस वर्ष यह फेलोशिप लेखक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता विनीत तिवारी को…
बदहाली के मौजूदा समय से पार पाने या कम-से-कम उसका एक रास्ता पहचानने के लिए हम आखिर किसके पास जाएं? क्या हमें इस मशक्कत में अपने समय के लेखकों, संपादकों की कुछ मदद मिल सकेगी? हम लोगों के वरिष्ठ साथी…
भाषाओं को धर्म से जोड़ना सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल, भारतीय भाषाओं का दस्तावेजीकरण अंतिम चरण में रिपोर्ट : कुमार सिद्धार्थ भोपाल, 30 जून। प्रख्यात भाषाविद् एवं साहित्यकार डॉ. गणेश देवी ने कहा कि भारत आज भी दुनिया के सबसे समृद्ध…
30 जून 1855 को संथालों ने केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध हथियार नहीं उठाए, बल्कि जल, जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की ऐतिहासिक घोषणा भी की। 171 वर्ष बाद भी ‘हूल’ केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि विस्थापन, संसाधनों…
क्या किसी नागरिक की पहचान उसके जीवन, समाज और इतिहास से तय होगी या केवल सरकारी अभिलेखों से? वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का मामला इस प्रश्न को नई गंभीरता से सामने लाता है। जब पासपोर्ट, आधार और मतदाता पहचान पत्र…
जंगल सिमट रहे हैं और वन्यजीव गांवों की ओर बढ़ रहे हैं। खेतों में हाथी, बस्तियों में तेंदुए और गांवों की चौखट तक पहुंचते बाघ केवल वन्यजीव संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि असंतुलित विकास की चेतावनी हैं। सवाल यह नहीं…