आंकड़े केवल संख्याएं नहीं होते, वे समाज की वास्तविक तस्वीर और भविष्य की दिशा भी बताते हैं। सरकारों की योजनाओं से लेकर मौसम की चेतावनी, जनगणना, रोजगार और आर्थिक विकास तक हर महत्वपूर्ण निर्णय सांख्यिकी पर आधारित होता है। राष्ट्रीय…
भोपाल, 28 जून। भारत की भाषाई विविधता, विलुप्त होती बोलियों और मातृभाषाओं के भविष्य पर देश के सबसे प्रतिष्ठित भाषा-चिंतकों में से एक प्रो. जीएन डेवी 30 जून को भोपाल में व्याख्यान देंगे। ‘हम सब’ और गांधी भवन के संयुक्त…
कुछ लोग अपने जाने के बाद भी स्मृतियों से नहीं, अपने विचारों और कर्मों से जीवित रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे, जिन्होंने पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज, नदी, जल, जंगल और मनुष्य…
स्वामी सहजानंद सरस्वती के 77वें महाप्रयाण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि एवं पुष्पांजलि अर्पित करते हुए संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा, सीतामढ़ी में ‘खेती के खतरे’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मोर्चा के जिलाध्यक्ष जलंधर यदुवंशी ने…
देश की कृषि और आर्थिक संप्रभुता को लेकर मंडराते खतरों के बीच, 25 जून को चंडीगढ़ का किसान भवन एक ऐतिहासिक बैठक का गवाह बना। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में देश भर के किसान,…
संपूर्ण क्रांति की असली कहानी सत्ता परिवर्तन से आगे शुरू होती है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने आंदोलन की चेतना को जीवन का संकल्प बनाया और जल, जंगल, जमीन, ग्राम स्वराज तथा सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से बदलाव…
क्या शिक्षा केवल स्कूल और पाठ्यपुस्तकों तक सीमित है, या वह जीवन, समाज और मानवीय संबंधों को समझने का भी माध्यम है? ‘सब मज़ेदारी है! कथा नीलगढ़’ इसी सवाल की गहरी पड़ताल करती है। आदिवासी जीवन के बीच किए गए…
ईरान युद्ध और उसके बाद हुए युद्धविराम ने एक बार फिर इतिहास के पन्ने खोल दिए हैं। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति का साक्षी रहा फ्रांस का वर्साई आज भी युद्ध और शांति के बीच खड़ी मानव सभ्यता की याद दिलाता…
कहा जा रहा है कि संवैधानिक बदलाव के लिए 850 सदस्यों वाली संसद बनाने की जुगत में सत्ताधारी भाजपा देशभर की राजनीतिक जमातों को ललचाकर, धमकाकर, डराकर विखंडित करने में लगी है। मीनाक्षी नटराजन के प्रकरण को देखें तो इस…
आधुनिक विकास के तमाम-ओ-तमाम खटरागों की तरह हमारे यहां खेती भी दिनों-दिन बदहाल होती जा रही है। कमाल यह है कि इस बदहाली को समाज, सरकार और सेठ की हैसियत के नागरिक विकास मानते और जपते रहते हैं। सवाल यह…