जनगणना 2027 : डिजिटल युग में भारत की सामाजिक-राजनीतिक पुनर्रचना
अरावली की नई परिभाषा : संरक्षण बचेगा या रास्ता खुलेगा खनन का?
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की प्रस्तावित नई परिभाषा के पर्यावरणीय, पारिस्थितिक और कानूनी प्रभावों के स्वतंत्र मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की है। यदि नई परिभाषा से संरक्षित क्षेत्र घटता है या नियामकीय रिक्तियाँ पैदा होती हैं, तो…
विज्ञान : कैसे आई ‘कृत्रिम बुद्धि’
आजकल दुनियाभर में ‘एआई’ यानि ‘कृत्रिम बुद्धि’ पर भारी बवाल काटा जा रहा है। एक पक्ष इसे इंसानों को मिली बेहतरीन सुविधा मानता है तो दूसरा इसे इंसानी दिमाग को नकारा बनाकर मशीनों के गुलाम में तब्दील करने की तरकीब।…
खाने लायक खेती
यदि बाजार को छोड़कर खेती उदरपूर्ति का जरिया बन जाए तो क्या हो? क्या हमारी मौजूदा उत्पादन पद्धति इंसानी वजूद को बरकरार रखने के काबिल हो पाएगी? क्या बदलाव करने होंगे, स्वास्थ्यवर्धक तरीकों से अपनी भूख भगाने के लिए? भारत…
45 वर्ष बाद नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (नर्मदा अवार्ड) की अब पुनर्समीक्षा संभव, राष्ट्रीय विस्थापित पुनर्वास आयोग गठित करने की सिफारिश : जन आयोग
इंदौर प्रेस क्लब में रिपोर्ट जारी; कहा- सभी विस्थापितों को मिले न्यायपूर्ण पुनर्वास इंदौर, 1 अगस्त। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (नर्मदा अवार्ड) के 45 वर्ष पूरे होने के बाद अब सरदार सरोवर परियोजना की व्यापक और निष्पक्ष समीक्षा का समय…
चरखा क्या बोले : इतिहास के करघे पर बुना गया गांधी का स्वप्न
महात्मा गांधी के चरखे को स्वराज, स्वदेशी और श्रम की प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में केंद्र में रखकर डॉ. मीरा झा का उपन्यास “चरखा क्या बोले” स्वतंत्रता आंदोलन और ग्रामीण भारत की जीवंत गाथा प्रस्तुत करता है। यह कृति…
कोटा मातृ मृत्यु प्रकरण: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राजस्थान सरकार से मांगा जवाब
जन स्वास्थ्य अभियान राजस्थान इकाई की शिकायत पर आयोग का संज्ञान जयपुर, 30 जुलाई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSAI) राजस्थान इकाई द्वारा कोटा में हुई मातृ मृत्यु एवं गंभीर स्वास्थ्य क्षति के मामले में दायर शिकायत…
मार्क्स, गाँधी और प्रेमचन्द : हमारे समय का संवाद
प्रेमचन्द को केवल हिन्दी के महान कथाकार के रूप में नहीं, बल्कि हमारे समय के एक जीवन्त वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में देखने का आग्रह करता है। बढ़ती असमानता, बाजारवाद, लोकतान्त्रिक संकट और सामाजिक विघटन के दौर में यह विमर्श…
मानसून नहीं, शहरों की व्यवस्था समस्या है
देश की राजधानी दिल्ली में हाल की बरसात में, हर साल की तरह, एक बार फिर जो हुआ वह क्या ‘चरम मौसम’ की वजह से होने वाली भारी वर्षा भर की करामात है? क्या यही कारनामा देशभर के लगभग सभी…
भागलपुर में लुप्त हो रही गांधी की स्मृतियों को बचाने की कोशिश
चंपारण के बाद महात्मा गांधी सबसे अधिक बार भागलपुर आए, लेकिन उनके आगमन की ऐतिहासिक स्मृतियां आज उपेक्षा और अतिक्रमण की शिकार हैं। बापू के भागलपुर आगमन के शताब्दी वर्ष पर जहां राष्ट्रीय समारोह की तैयारियां जोरों पर हैं, वहीं…
सिनेमा की सार्थकता : जावेद अनीस की जरूरी किताब
करीब डेढ साल पहले हम सबसे अचानक सदा के लिए विदा लेने वाले जावेद अनीस ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर अपनी कलम चलाई थी। फिल्में भी उनकी नजर और नजरिए से बची नहीं थीं। हाल में फिल्मों…
























