
26 जून, 1922 को इन्दौर में जन्मे राहुल बारपुते का ‘जन्म शताब्दी वर्ष’ इन्दौर में मनाया गया। साहित्य, कला, संगीत, वास्तु-शिल्प, नाटक और शिल्पकला के दिग्गजों से राहुलजी की प्रगाढ़ मैत्री थी, लेकिन राहुलजी ने अपने आपको सम्मान पुरस्कार और प्रसिद्धि से दूर रखा। सुबह नियमित तैरना, शाम को बैडमिंटन और रात को अध्ययन उनका नियम था। अंग्रेजी और हिन्दी भाषा पर उनका प्रभुत्व था। मराठी साहित्य में दलित साहित्य को वे प्रगतिशील समाज का अंग मानते थे।
26 जून, 1922 को इन्दौर में जन्मे राहुल बारपुते का ‘जन्म शताब्दी वर्ष’ इन्दौर में 05 सितम्बर, 2022 के दिन ‘नाट्य भारती’ और शहर की सक्रिय सांस्कृतिक संस्था ‘सूत्रधार’ के तत्वावधान में मनाया गया। राहुलजी को याद करते हुए पत्रकार श्रवण गर्ग बोले -‘राहुलजी यदि नहीं होते तो राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, श्रवण गर्ग, अभय छजलानी, व्यंग्यकार शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, रमेश बक्षी और कवि सरोज कुमार कहाँ होते? एक जिले का अखबार होने के बावजूद यदि ‘नई दुनिया’ राष्ट्रीय स्तर को छू गया तो इसका पूरा श्रेय राहुल बारपुते को जाता है। ‘माधुरी’ के पूर्व संपादक और हिन्दी शब्द-कोशाकार अरविंद कुमार कहते थे कि देशी भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक राहुल बारपुते ही थे।’
सन् 1945 में ‘नैनी इन्स्टीट्यूट, इलाहाबाद’ से कृषि-यांत्रिकी की डिग्री लेकर राहुलजी इन्दौर आए तो पत्रकार बनने की लालसा उन्हें काँग्रेस के मजदूर नेता व्ही.व्ही. द्रविड संचालित ‘मजदूर संदेश’ पत्रिका में नौकरी करने ले गई। द्रविड साहब बोले 13 रूपये माहवार देंगे। राहुलजी बोले मुझे 12 रूपया ही चाहिये। इस तरह स्वेच्छा से लौटाया हुआ रूपया राहुलजी के कृतित्व और यथार्थ जीवन का सार था कि धन को अपने ऊपर कभी भी हावी मत होने दो।
‘मजदूर संदेश’ में कुछ दिन काम करने के बाद होलकर शासन के अधीन प्रांतीय सरकार के प्रमुख तात्या साहब सर्वटे और ‘नई दुनिया’ के मालिक लाभचंदजी छजलानी उन्हें ‘नई दुनिया’ ले आए। उन दिनों कृष्णकांत व्यास ‘नई दुनिया’ के संपादक थे। बाद में राहुलजी ने ‘नई दुनिया’ की बागडोर संभाली। राहुलजी के मित्र रणबीर सक्सेना बताते थे कि राहुलजी को पर्वाह ही नहीं थी कि उन्हें क्या तनख्वाह मिल रही है। रास्ते पर खड़े होकर उन्होंने ‘नई दुनिया’ अखबार बेचा और धन जुटाने में भी मदद की। घर का खर्च राहुलजी की शिक्षिका पत्नी विमला बारपुते चलाती थीं।
‘नई दुनिया’ को निखारने के लिए उन्होंने व्यंग्यकार शरद जोशी के मित्र और स्थानीय गुजराती कॉलेज के अंग्रेजी के व्याख्याता राजेन्द्र माथुर को लेख लिखने के लिए आमंत्रित किया। प्रतिभाशाली रज्जू बाबू (राजेन्द्र माथुर) ने शीघ्र अपने अविस्मरणीय लेखों से, खासकर ‘पिछला सप्ताह’ कॉलम से ‘नई दुनिया’ में चार चांद लगा दिये थे। सन् 1971 में रज्जू बाबू पूर्ण रूप से ‘नई दुनिया’ के संपादक बने और सन् 1982 में ‘नई दुनिया’ छोड़कर उन्होंने दिल्ली में ‘नव भारत टाईम्स’ के संपादक का पद सुशोभित किया।
सन् 1955 में इंटर की परीक्षा पास कर प्रभाष जोशी देवास के पास क्षिप्रा में सुनवानी-महाकाल गांव में शिक्षक बने। सन् 1960 में ‘भूदान यात्रा’ के दौरान विनोबाजी पूरे एक माह इन्दौर में रहे। उनके प्रवचनों की रिपोर्टिंग के लिए राहुलजी प्रभाषजी को ‘नई दुनिया’ ले आए। कलम के धनी प्रभाषजी ने अपना दायित्व बखूबी निभाया।
नाटकों में रूचि के कारण वे ‘नाट्य भारती’ के ‘लिटिल थिएटर’ के नाटकों की समीक्षा भी करते थे। सन् 1966 में प्रभाषजी ने ‘नई दुनिया’ छोड़ी। दो साल भोपाल में संपादक रहे, बाद में जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर वे सन् 1968 में दिल्ली में रामनाथ गोयनका द्वारा संचालित ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समूह में शामिल हुए और अंततः ‘जनसत्ता’ अखबार को देश भर में लोकप्रिय किया।
अखबार केवल समाचार पत्र नहीं, बल्कि मनोरंजन और प्रबोधन करने वाला सांस्कृतिक और सामाजिक दस्तावेज है, इसका पूरा भान राहुलजी को था। लिहाजा उन्होंने व्यंग्यकार शरद जोशी से ‘और’ तथा हरिशंकर परसाई से ‘सुनो भाई साधो’ कॉलम प्रारंभ करवाया। सरोज कुमार से कविता के लिए ‘स्वांत दुखाय’ शुरू किया। राहुलजी के ‘दूसरा पहलू’ कॉलम ने पाठकों को हमारे जीवन में घटित हर चीज को आत्मपरकता से यथार्थ में देखना सिखाया। पाठकों में लेखकों की नयी पौध विकसित हो, इसलिये हर एक को ‘अधबीच’ कॉलम लिखने आमंत्रित किया।
अपना सामाजिक दायित्व निभाने उन्होंने इन्दौर में मुकुंद कुलकर्णी द्वारा चलाए गए ‘अभ्यास मंडल’ की भाषण मालाओं को अपने अखबार में स्थान दिया। बाबा आमटे द्वारा ‘आनंदवन’ में ‘महारोगी सेवा समिति’ और हेमलकसा में आदिवासियों के उत्थान के लिए कार्य कर रहे ‘लोक बिरादरी प्रकल्प’ को भी ‘नई दुनिया’ में उचित स्थान दिया। इतना ही नहीं मध्यप्रदेश शासन के विरोध के बावजूद मेधा पाटकर द्वारा बांध विस्थापितों की समस्याओं को ‘नई दुनिया’ में उचित स्थान मिलता था।
गांधीजी के परम शिष्य महाराष्ट्र के साने गुरूजी द्वारा भारत के विभिन्न भाषा-भाषाईयों को एकत्रित करने वाली उनकी अनूठी ‘अंतर भारती’ के शिविरों में राहुलजी जाते थे। निमाड़ की खेती देखने और उनके किसानों से चर्चा करने राहुलजी बड़वानी, अंजड़ दौरे पर जाते थे।
राहुलजी दार्शनिक विचारों के थे। वे कहते थे कि मैंने आज तक केवल डेढ़ भारतीय ही देखे हैं, एक गांधी और आधा लोहिया। बाबा आमटे का कार्य देखने के बाद कहने लगे थे कि ये दूसरा गांधी है। ‘नाट्य भारती’ में हिन्दी रंगमंच की शुरूआत उन्हीं के विचारों से हुई जो सन् 1953 में हमने ‘नूरजहाँ’ नाटक से प्रारंभ की थी।
‘ग्वालियर मेले’ में हमारे द्वारा मंचित ‘रेशमी गांठें’ देखने के बाद भारत शासन के गीत एवं नाट्य विभाग के निर्देशक कर्नल हेमचन्द्र गुप्ते ने प्रस्ताव रखा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास के शासन के कार्यों को नाटक के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाएं। तद्नुसार बाबा डिके, राहुल बारपुते, विष्णु चिंचालकर और गायिका सुमन दांडेकर ने 15 अगस्त, 1955 को ‘नाट्य भारती’ की स्थापना की।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ‘नई दुनिया’ जैसे प्रतिष्ठित अखबार का प्रमुख संपादक राजस्थान, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के गांवों में बगैर मानधन लिए नाटकों के माध्यम से नये भारत का संदेश देते घूम रहा है?
साहित्य, कला, संगीत, वास्तु-शिल्प, नाटक और शिल्पकला के दिग्गजों से राहुलजी की प्रगाढ़ मैत्री थी, लेकिन राहुलजी ने अपने आपको सम्मान पुरस्कार और प्रसिद्धि से दूर रखा। सुबह नियमित तैरना, शाम को बैडमिंटन और रात को अध्ययन उनका नियम था। अंग्रेजी और हिन्दी भाषा पर उनका प्रभुत्व था। मराठी साहित्य में दलित साहित्य को वे प्रगतिशील समाज का अंग मानते थे।
युवा वर्ग के प्रति वे आशावान थे और उनसे वे खुलकर बातें करने थे। मेरी युवावस्था में उन्होंने मुझसे तीन सवाल पूछे थे :- (1) नौकरी क्यूं करते हो? पैसा कमाने – मेरा जवाब था। (2) पैसा क्यूं चाहिये? – जिन्दा रहने के लिए मैंने कहा। (3) जिन्दा क्यूं रहना है? इस प्रश्न का जवाब ढूंढने में मेरे 22 वर्ष गुजर गए, जब मैंने सन् 1986 में जैविक-खेती और कुटीर उद्योगों से प्रारंभ कर भारत आत्मनिर्भर कैसे बन सकता है, यह सन् 2007 में सिद्ध किया। (सप्रेस)