साम्प्रदायिक और नस्लीय अलगाव के इस दौर में ब्रिटेन का यह उदाहरण काबिल-ए-तारीफ है जिसमें पचास पेंस का ‘डायवर्सिटी क्वाइन’ जारी करके वहां की सरकार ने बता दिया है कि वह देश किसी एक जाति, धर्म, भाषा, खान-पान और...
तमाम लोग जो अर्नब को एक आपराधिक पर ग़ैर-पत्रकारिक प्रकरण में हिरासत में भेजे जाने पर संतोष ज़ाहिर कर रहे हैं उन्हें शायद दूर का दृश्य अभी दिखाई नहीं पड़ रहा है। उन्हें उस दृश्य को लेकर भय और...
सर्कस के लिए ‘घोडों के’ जिस ‘चलते-फिरते घेरे’ की बात की गई है उसमें मनोरंजन होना एक जरूरी शर्त है। ध्यान से देखें तो सबसे बडे और पुराने, दोनों छोरों पर लोकतंत्र यही करता दिखाई देता है। चुनावों को...
तीन साल पहले एकरूपता की खातिर लगाए गए ‘जीएसटी’ ने तमाम छोटे-बडे व्यापारियों, आम खरीददारों और सरकारी अमले में से किसी को संतुष्ट नहीं किया है। आखिर क्या है, ‘जीएसटी’ का तिलिस्म? प्रस्तुत है, इस विषय की विस्तृत पड़ताल...
पूंजी और राज्य की आधुनिक अवधारणा एक अर्थ में हिंसक अवधारणा साबित हुई है। उसने एक तरफ, अमीरी-गरीबी के बीच गहरी, अश्लील खाई पैदा की है और दूसरी तरफ, राज्य को जरूरत से ज्यादा शक्ति-सम्पन्न बनाया है। आज यदि...
मीडिया के कुछ इलाक़ों में इन दिनों अराजकता का दौर चल रहा है। कहा जा सकता है कि हालात एक विपरीत आपातकाल जैसे हैं।आपातकाल के दौरान सेन्सरशिप थी, प्रकाशित होने वाली (प्रसारण केवल सरकारी ही था, इलेक्ट्रॉनिक चैनल नहीं...
दुनिया की अमीरी उजागर करने के लिए जिस तरह ‘फोर्ब्स’ पत्रिका समेत अन्य भांति-भांति की रिपोर्टं प्रकाशित की जाती हैं, ठीक उसी तरह दुनियाभर की भुखमरी उजागर करने की खातिर ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट’ का सालाना प्रकाशन होता...
पिछले दो-ढाई दशकों से सम्पत्ति की परिभाषा बदल रही है। अब रुपए-पैसे, जमीन-जायदाद आदि की बजाए ‘सूचनाओं’ को अहमियत दी जाने लगी है। जाहिर है, यह ‘सम्पन्नता’ भी चोरों की निगाह से बच नहीं पा रही। सवाल है कि...
आधुनिक व्यापार-व्यवसाय ने अब तेजी से प्राकृतिक संसाधनों को अपनी चपेट में लेना शुरु कर दिया है। जंगल, जिन्हें सुप्रीमकोर्ट द्वारा दी गई परिभाषा के मुताबिक केवल रिकॉर्ड में जंगल की तरह दर्ज होना ही काफी है, निजी कंपनियों...
आज के राजनीतिक फलक को देखें तो विकास की मौजूदा अवधारणाओं और उसे लेकर की जाने वाली राजनीति ने भी कम्युनिस्टों को कमजोर किया है। तरह-तरह के विस्थापन-पलायन, जल-जंगल-जमीन की बदहाली और पर्यावरण-प्रदूषण के बुनियादी और सर्वग्राही सवाल आज...