प्रख्यात कानूनविद, पूर्व महाधिवक्ता और समाजसेवी आनंद मोहन माथुर का 97 वर्ष की आयु में निधन
इंदौर, 22 मार्च। जाने माने कानूनविद, पूर्व महाधिवक्ता और समाजसेवी आनंद मोहन माथुर का 97 वर्ष की आयु में शनिवार अलसुबह निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन से समाज ने एक ऐसा प्रहरी खो दिया, जिसने न्याय और मानवाधिकारों के लिए अनेक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयाँ लड़ीं। उन्होंने कई संवेदनशील मामलों में नि:स्वार्थ भाव से वकालत कर जरूरतमंदों को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। माथुर ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कानून विशेषज्ञों के रूप में देश का प्रतिनिधित्व भी किया है। परिवार से जुडे हुए अधिवक्ता अभिनव धनोतकर ने बताया कि अंतिम संस्कार रविवार को सुबह 11 बजे रामबाग मुक्तिधाम पर होगा।
शहर के विकास में योगदान
आर्थिक संकटों से जूझते हुए भी उन्होंने शहर के विकास के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने इंदौरवासियों को झूला पुल की सौगात दी। इसके अलावा स्कीम 54 स्थित आनंद मोहन माथुर सभागृह, आनंद मोहन माथुर सेंटर फार एडवांस सर्जरी (एमवायएच), एड्स पीड़ितों के लिए मानवीय ट्रस्ट, आनंद मोहन माथुर शासकीय माध्यमिक शाला भवन, जयकुंवर बाई माथुर ओपीडी, लक्ष्मीनारायण माथुर आइसीयू, रामबाग मुक्तिधाम में पत्नी कुंती माथुर की स्मृति में कुंती माथुर सभागृह, आनंद मोहन माथुर उद्यान आदि शहर को समर्पित किए। इन सभी सुविधाओं को उन्होंने अपने खर्च पर बनवाया और उनकी देखरेख भी स्वयं की।
जन्म, शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
आनंद मोहन माथुर का जन्म इंदौर में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा शहर के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों से प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए विधि क्षेत्र में प्रवेश किया। उन्होंने कानून की डिग्री हासिल करने के बाद न्यायिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। वे मप्र में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कार्यकाल के दौरान 10 साल तक महाधिवक्ता (एजी) के पद पर रहे।
आर्थिक संकटों के बावजूद संघर्ष
माथुर साहब ने 1943 में हाई स्कूल पास किया, तो पिता ने इच्छा जताई कि बेटा डॉक्टर बने और समाजसेवा करे। मेडिकल कॉलेज में प्रवेश भी मिल गया, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण एक हजार रुपये का शुल्क न भर पाने के कारण वे मेडिकल की पढ़ाई नहीं कर सके। श्री माथुर ने आजादी आंदोलनों में भी भाग लिया था। किशोरावस्था में वे अंग्रेजों के खिलाफ हो रहे आंदोलनों में हिस्सेदारी करने लगे थे। इसका खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ा। साथ ही उन्हें अपने परिवार का साथ भी छोड़ना पड़ा था। उन्होंने कुछ समय इंदौर की मालवा मिल में मजदूरी भी की। अप्रैल 1948 में बी.एस.सी. की परीक्षा मेरिट में उत्तीर्ण करने के बाद जब वे लखनऊ से इंदौर लौटे, तो घर की खराब आर्थिक स्थिति देखकर किसी भी प्रकार के रोजगार का संकल्प लिया। इस दौरान उन्होंने कपड़ा मिल में मजदूर के रूप में भी काम किया। अपने श्रम और अध्ययन-मनन से उन्होंने आगे चलकर भारत के श्रेष्ठ महाधिवक्ता के रूप में पहचान बनाई।
गांधीवादी संस्थाओं से जुड़ाव
आनंद मोहन माथुर गांधीवादी विचारधारा से गहराई से जुड़े थे। उन्होंने महात्मा गांधी के आदर्शों को न केवल आत्मसात किया बल्कि उसे अपने जीवन और कार्यों में भी उतारा। गांधीवादी संस्थाओं से उनकी सक्रिय भागीदारी रही और वे सदैव सत्य, अहिंसा और जनसेवा के मार्ग पर चलते रहे। वे इंदौर के कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट, विसर्जन आश्रम, मध्यप्रदेश सर्वोदय मंडल आदि संस्थाओं से भी जुडे रहे।
नर्मदा बचाओ आंदोलन और जनसंघर्षों से जुड़ाव
नर्मदा बचाओ आंदोलन से उनका गहरा नाता था। उन्होंने इस आंदोलन का न केवल समर्थन किया, बल्कि कानूनी रूप से भी संघर्षरत रहे। उन्होंने विस्थापितों की आवाज बुलंद की और उनके हक की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई। वे हमेशा जनसंघर्षों के साथ खड़े रहे, चाहे वह आदिवासी अधिकारों का मामला हो या पर्यावरण संरक्षण का।
कई भाषाओं के जानकार
आनंद मोहन माथुर न केवल विधि विशेषज्ञ थे, बल्कि वे कई भाषाओं के जानकार भी थे। हिंदी और अंग्रेजी के अलावा वे मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी और उर्दू भाषा में भी निपुण थे। जब वे मराठी बोलते थे, तो कोई यह नहीं समझ सकता था कि यह उनकी मातृभाषा नहीं है। इसी प्रकार, गुजराती और बंगाली भाषा में भी वे सहज संवाद कर सकते थे।
अन्य सामाजिक कार्य और योगदान
उन्होंने समाज के वंचित और शोषित वर्ग के उत्थान के लिए कई सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर कार्य किया। वे महिला सशक्तिकरण, शिक्षा के प्रचार-प्रसार और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। उनका मानना था कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानूनी सुधारों से नहीं, बल्कि जनचेतना के जागरण से संभव है। पर्यावरण संरक्षण अनुसंधान एवं विकास केंद्र ( सीईपीआरडी) के अध्यक्ष के बतौर अपनी सेवाएं दी। वे अभ्यास मंडल के संरक्षण एवं मार्गदर्शक रहे। अभ्यास मंडल एवं अन्य संस्थाओं के माध्यम से इंदौर के लिए कई बडे मुद्दों को उठाने में उनकी अहम भूमिका रही। इंदौर में नर्मदा लाने के लिउ चले आंदोलन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उनकी स्मृतियाँ सदैव प्रेरणा देती रहेंगी और उनके विचार समाज के संघर्षशील लोगों के लिए मार्गदर्शक बने रहेंगे।