शंकर गुहा नियोगी : 28 सितंबर पुण्‍य स्‍मरण

रामचंद्र गुहा

सत्तर के दशक में पहले ‘छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ’ (सीएमएसएस) और फिर ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ (सीएमएम) का गठन करके मजदूरों, किसानों में एक नई राजनीतिक चेतना विकसित करने वाले कॉमरेड शंकर गुहा नियोगी ‘संघर्ष और निर्माण’ की विचारधारा में भरोसा रखते थे। दल्ली-राजहरा में मजदूरों द्वारा निर्मित और संचालित “शहीद अस्पताल” इसका एक उदाहरण है। आजाद भारत में हुए प्रतिकार के अहिंसक आंदोलनों ने कॉमरेड नियोगी से बहुत कुछ सीखा है। आगामी 28 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर प्रस्तुत है, कोलकाता के ‘द टेलीग्राफ’ में 14 सितंबर 2019 को मूल अंग्रेजी में प्रकाशित रामचंद्र गुहा के लेख का संपादित अंश। इसे छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता राजेन्द्र सायल ने हिन्दी अनुवाद किया है।

ट्रेड यूनियन नेता एके रॉय, जिनका अभी हाल ही में निधन हुआ है, भारतीय राजनीति के एक ऐसे युग के प्रतिनिधि थे जो निश्चित तौर पर अब अतीत का हिस्सा हैं। धनबाद के सांसद के तौर पर उन्होंने तीन कार्यकाल गुजारे, वह भी एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में, बिना किसी राजनीतिक दल से संबद्ध होकर। उनके चुनाव अभियान के लिए संसाधन खदान मजदूरों और मध्यम वर्गीय शुभचिंतकों द्वारा जमा किए जाते थे। रॉय धनबाद में अपने समर्थकों की तरह एक फूस की झोपडी में बिना बिजली के निवास करते थे। उनका चरित्र और जीवन-शैली भारतीय संसद में बैठने वाले उन सम्पन्न लोगों से कहीं परे हटकर थी, जो ‘मित्र पूंजीपतियों’ की तिजोरी के बल-बूते पर ऐश करते हैं।  

कॉमरेड रॉय की मृत्यु के बारे में पढ़कर मुझे 1981 में मिले उस एक मौके की याद आ गई जब मैंने उनसे मिलने की कोशिश की थी। तब मैं एक पर्यावरण सम्मेलन में वालंटियर था और मुझे रॉय को आमंत्रित करने भेजा गया था। मैं उनके मात्र दो-कमरों वाले सांसद-फ्लैट पर गया जो सांसदों के ‘लुटियन शैली’ के बंगलों से कहीं भी मेल नहीं खाता था। मैंने दरवाजा खटखटाया तो थोड़ी देर में एक लम्बे कद-काठी के कुरता-पायजामा पहने आदमी ने दरवाजा खोला। यह रॉय नहीं थे, लेकिन मैंने उन्हें एकदम पहचान लिया। वे शंकर गुहा नियोगी थे, छत्तीसगढ़ के जुझारू मजदूर नेता। उन्होंने बड़ी शालीनता से बताया कि रॉय घर पर नहीं हैं, लेकिन अगर कोई सन्देश हो तो वह उन्हें बता देंगे।

बांग्ला लेखक मनोरंजन बैपारी के संस्मरण पढ़ते हुए मुझे फिर से गुहा नियोगी याद आए। उनके बारे में बैपारी की पहली छाप बहुत-कुछ मेरी तरह ही थी फर्क सिर्फ इतना था कि उन्होंने गुहा नियोगी को हमारी भव्य राजधानी में नहीं बल्कि मध्य भारत के एक गांव में देखा था। ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ की एक सभा में बैपारी ने देखा कि “एक लम्बा-दुबला आदमी, आंखों में चमक, खादी का कुरता-पायजामा पहने, नीचे घास पर आम लोगों के साथ बैठा था। हालांकि भीड में भी वह अलग दिख रहा था। उसके सिर और काँधे दूसरों के मुकाबले कहीं ऊँचे थे-वह सिर जिसने अन्याय के सामने झुकना नहीं सीखा था।‘’ 

बैपारी बाद में गुहा नियोगी के घर गए थे। “मुझे यह देख कर ताज्जुब हुआ कि उसका घर बस्ती में रहने वाले किसी और मजदूर की मानिंद ही था। एक कमरा जिसके दोनों ओर बारामदा था। मिट्टी की दीवारें जिनके ऊपर खपरेल की छत। जब मैं वहां पहुँचा तो शंकर गुहा नियोगी, संगठन से मिलने वाले 750 रुपयों के अपने मासिक भत्ते के बल-बूते पर, अपनी पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे के छोटे से परिवार के साथ खुश और शांत, चाय की चुस्कियां लेते हुए बैठे थे।”.

शंकर गुहा नियोगी ने अपनी जिन्दगी की शुरुआत माक्सवादी के तौर पर की थी, लेकिन समय के साथ-साथ वे गाँधी के करीब आ गए थे। बैपारी गुहा नियोगी के उस फलसफे और उसके अमल का जिक्र करते हैं, जिस पर चलकर गुहा नियोगी ने अपना यह सफर तय किया था। उन्होंने बैपारी को बताया थाः “जय प्रकाश नारायण ने एक रचनात्मक आंदोलन का प्रयास किया जो असफल रहा। नक्सलवादियों ने एक आक्रामक आंदोलन का प्रयास किया, वह भी असफल हुआ। इसलिए मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि रचनात्मक और आक्रामक के बीच एक सामंजस्य बैठाने की जरुरत है। इसको ध्यान में रखते हुए ही अपने संगठन के माध्यम से हमने प्रयास किया कि यहाँ हम अस्पताल, छोटे-छोटे स्कूल, वर्कशॉप, सहकारी और सांस्कृतिक समितियों का निर्माण करेंगे। इन प्रयासों के जरिये हमने लोगों को यह बताने की कोशिश की है कि जिस नए समाज की हमने परिकल्पना की है, उसका भावी स्वरुप कैसा होगा। यहाँ हम एक और प्रयास भी करते हैं कि लोकतंत्र के तहत हमें जो भी मौके मिले हैं उनका अधिकतम लाभ उठाएं-जैसे कि सभा, जुलूस-रैली, प्रदर्शन, ज्ञापन आदि।‘’

गुहा नियोगी ने कहा कि ‘’पारंपरिक मजदूर यूनियनों के संकीर्ण और अर्थवादी दृष्टिकोण में कारखाने की चार-दीवारी से बाहर एक मजदूर की जिन्दगी के बारे में कोई भी रचनात्मक सोच-विचार है ही नहीं, लेकिन हमने ऐसा किया है। हमने पता लगाने की कोशिश की है कि एक पुरुष और महिला को अपनी जिन्दगी को स्वस्थ, प्रगतिशील और सुन्दर बनाने के लिए कौन-कौन सी चीजों की जरुरत है।” 

‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ (छमुमो) की विशिष्टता को समझाते हुए गुहा नियोगी आगे बताते हैंः “हमने मजदूरों के लिए उच्चतम वेतन की मांग रखी और वह मिल भी गया,लेकिन यह वेतन दारू पीने में खर्च हो गया। इसलिए हमें शराब-बंदी आंदोलन शुरू करना पड़ा। गौर करें कि मजदूर यूनियन के परंपरागत मार्ग का यह कभी भी हिस्सा नहीं रहा इसलिए हमें प्रेरणा स्वरुप गांधी जी के रास्ते को अपनाना पड़ा। हमने सभी ‘वादों’ (इज्म्स) में निहित कल्याणकारी सिद्धांतों से कुछ-न-कुछ लिया है-मार्क्सवाद, गांधीवाद, लोहियावाद,अम्बेडकरवाद। हमने उनका अध्ययन किया है, उनसे कुछ लिया है और अपनी जरूरतों के मुताबिक उनको यहां लागू किया है।”

पत्रकार और लेखिका रजनी बक्शी ने शंकर गुहा नियोगी पर एक सारगर्भित श्रदांजलि लिखी थी। उसमें राज्य के उस दमन का भी जिक्र था जो गुहा नियोगी ने झेला था। आपातकाल के दौरान वे सालभर जेल में रहे, सरकार उन पर हमेशा झूठे और बेबुनियाद मुकदमे लगाती रही और अंत में 48 वर्ष की उम्र में 28 सितम्बर 1991 को उद्योगपतियों के भाड़े के गुंडों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई। 

रजनी बक्शी याद दिलाती हैं कि गांधी जी की ही तरह, गुहा नियोगी अपने ‘समय से पहले के पर्यावरणविद्’ थे। खदानों और कारखानों के इर्द-गिर्द बहने वाली स्वच्छ और निर्मल जल वाली नदियों में प्रदूषण को लेकर वे सतर्क हुए और एक बेतुके बांध का विरोध भी किया। नियोगी ने अपने एक लेख में वन-प्रबंधन के लोकतंत्रीकरण और पानी तथा पर्यावरण को प्रदूषित करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाई की मांग की थी। उन्होंने लिखा था कि “पर्यावरणीय विनाश के कारणों का हमें गहराई से विश्लेषण करना होगा। पर्यावरणीय मुद्दों पर चेतना को राष्ट्रीय स्तर पर समग्र तौर पर विकसित किया जाना चाहिए।” उन्होंने आगे लिखा था. “यूनियन के कार्यकर्ता जितने जागरूक होंगे, उतना ही वे भारत और विश्व भर में पर्यावरणीय आन्दोलन की समझ विकसित करने का प्रयास करेंगे। वे पर्यावरण आंदोलन के साथ भाईचारे की कड़ियाँ बनाने के लिए भी काम करेंगे और उसकी घटनाओं और गतिविधियों में यूनियन का प्रतिनिधित्व करने के लिए कार्यकर्ताओं और सामान्य सदस्यों को तैयार करेंगे।”

इस लेख में आगे चलकर गुहा नियोगी ने विशेष नीतियों को निर्धारित करने के सुझाव भी दिए थे। जंगलों पर गुहा नियोगी ने लिखा: “जब लोगों को यह महसूस होता है और वे जानते हैं कि जंगल सचमुच उनके ही हैं, तब, उस दिन से प्रत्येक जन-यहाँ तक कि बच्चे भी-उस पर निगरानी रखेंगे और जंगलों को बचा कर रखेंगे। जंगल चोरों को रोक दिया जायेगा और नकारा व गैर-जिम्मेदार अफसरों द्वारा पैदा की जाने वाली खामियां दूर की जाएंगी। जंगल जब सामूहिक हितों के संरक्षण का साधन बनता है, तब इसके सभी निवासी अवैध रूप से पेड़ों को काटने के लिए इस्तेमाल की गई किसी भी कुल्हाड़ी के हर वार के खिलाफ संघर्ष करते हैं। ऐसे में सामुदायिक हितों की सुरक्षा से ही राष्ट्रीय हितों की रक्षा होगी और यह न केवल पर्यावरण की सुरक्षा करेगा, बल्कि मानव जाति के भविष्य को भी सुनिश्चित करेगा।”

नियोगी ने अपने इस लेख को, आज भी मौजूं इन गुंजायमान वाक्यों के साथ समाप्त किया: “सच तो यह है कि हमें अपनी पृथ्वी और अपने गृह को सुरक्षित रखना होगा। पेड़-पौधे, स्वच्छ पानी, शुद्ध हवा, पशु-पक्षी और मानव जाति-हम सब मिलकर इस दुनिया की संरचना करते हैं। संवेदनशील विचारों और लचीले कार्यकर्मों के जरिये हमें प्रकृति और विज्ञान के बीच के इस संतुलन को बनाये रखना होगा। यह लोगों की चेतना को विकसित करने और उसे आधार बनाकर ही संभव होगा।”

अपने संस्मरण में मनोरंजन बैपारी लिखते हैं“नियोगी जी को किसी एक विचारधारा में बांधकर कबूतरों की तरह दडबों में नहीं रखा जा सकता। वह मुश्किल ही नहीं, असंभव प्रयास होगा।‘’ एक युवा आदिवासी नेता रवि टेलर ने बैपारी को नियोगी की मृत्यु के कारणों और परिणामों को समझाने का प्रयास किया: “जब तक वे जिंदा थे, उन्होंने आदिवासियों के दिल और दिमाग में संवैधानिक व्यवस्था में आशा और विश्वास की ज्वाला को जलाये रखा। इसी कारण तमाम लोगों ने नियोगी को छत्तीसगढ़ के गाँधी की संज्ञा दी और इसी के चलते उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। मजदूरों की न्यायसंगत मांगों को पुलिस और उद्योग माफिया की बंदूकों ने खामोश कर दिया। अब ये मजदूर अपनी शिकायतों को लेकर किसके पास जाएँ?” 

निष्ठा और साहस के सन्दर्भ में एके रॉय और शंकर गुहा नियोगी एक ही पत्थर से तराशे गए अनमोल हीरे थे। कॉमरेड रॉय की तरह के मूल विचारक जो किसानों और श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करना जानते हों, अब संसद में नहीं बैठ सकते। फिलहाल कुछ समय के लिए कोई दूसरा शंकर गुहा नियोगी भी पैदा नहीं हो सकता। राज्य शंकर गुहा नियोगी के समय की तुलना में अहिंसक असंतोष के प्रति कम सहनशील और अधिक दमनकारी हो गया है। इस अंधेरे समय में भारतीयों के लिए यह अनिवार्य है कि रॉय और नियोगी की याद को बनाए रखा जाये। (सप्रेस)

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