अशोक भारत

देश का साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ रहा है। जो काम कभी अंग्रेजी हुकूमत करती थी वही काम इस समय देश का शासकवर्ग कर रहा है। देश का साम्प्रदायिक वातावरण बिगाड़ने, लोगों को बांटने और शासन करने की साजिशें परवान चढ़ रही हैं। ऐसे में भगतसिंह का साम्प्रदायिकता पर स्पष्ट विचार बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी-उत्‍तरप्रदेश, हिमाचल आदि इलाकों में आज भी भगतसिंह की गाथा गूंजती है।

तेइस साल की उम्र में देश के लिए हँसते-हँसते फांसी के फंदे को वरण करने वाले भगतसिंह का सपना क्या था? इस संदर्भ में भगतसिंह के उस बयान का, जो उन्होंने न्यायालय के समक्ष लिखित रूप से प्रस्तुत किया था, उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। “स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। प्रत्येक राष्ट्र अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का स्वामी है। यदि कोई सरकार जनता को मूलभूत अधिकारों से वंचित करती है, तो जनता का केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकारों को समाप्त कर दे।”

स्वतंत्रता, जिसे भगतसिंह प्रत्येक नागरिक का ‘अमिट अधिकार’ समझते थे, की आज देश में क्या स्थिति है? आजादी के बाद देश ने वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई, जिसकी बुनियाद में समता, स्वतंत्रता और विश्वबंधुत्व के विचार रहे हैं। इसी के अनुरूप संविधान में प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तथा इसकी रक्षा के लिए संवैधानिक उपचार का प्रावधान दिया गया है। यह बात अवश्य ही महत्त्वपूर्ण है कि पिछले सात दशक से यह प्रणाली देश में सफलतापूर्वक चल रही है, लेकिन लोकतंत्र सिर्फ ढांचे का नाम नहीं है। यह मूल्य, मान्यता और परम्परा से जुड़ा मामला भी है।

हाल के वर्षों मे इसमें भारी गिरावट देखने को मिली है। राजनीतिक दल स्वयं इसे पूरी तरह अंगीकार करने में सफल नहीं रहे हैं। राजनीतिक दलों की पूरी शक्ति एक व्यक्ति के हाथ में केन्द्रित होती है। इसमें कोई दल अपवाद नहीं है। यही दल चुनाव जीतकर राज्य अथवा केन्द्र की सत्ता का संचालन करते हैं, जिसका स्पष्ट प्रभाव शासन-प्रशासन पर लोकतांत्रिक मूल्यों की भारी गिरावट के रूप में देखने को मिलता है। लोकतंत्र असहमतियों के बीच सहमति बनाकर चलने का भी नाम है। मौजूदा दौर में राजनीतिक दलों एवं संस्थानों में इसकी गुंजाइश बहुत कम, न के बराबर हो गई है।

कभी ‘इन्दिरा इज इन्डिया’ का नारा लगता था, आज कहा जा रहा है कि जो मोदी के साथ नहीं, वह देश के खिलाफ है। अब तो गरीबों के हक में बोलना, विकास नीति या सरकार की नीतियों का विरोध देशद्रोह करार दिया जा रहा है। बिना चर्चा और संवाद के खारिज करने की प्रवृत्ति मूल रुप से लोकतंत्र विरोधी, फासीवादी है। स्पष्ट है भगतसिंह जिस स्वतंत्रता के अमिट अधिकार की बात करते थे, वह आज भी आम जनता की पहुंच से बहुत दूर है।

देश की स्थिति पर नजर डालें तो पाते हैं कि आजादी के बाद के सात दशक से ज्यादा के सफर की जो तस्वीर उभरती है वह बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं है। आज विकास के नाम पर हमारी सरकारें साम्राज्यवादी देशों के एजेन्डा को आगे बढाने में लगी हैं। आज गरीब, किसान, मजदूर, आदिवासी को उनके रोजगार, रहवास, खेती, जल, जंगल और जमीन से विकास के नाम पर बेदखल किया जा रहा है। आज विकास का मतलब पहाड़ों को खोदना, जंगल को खत्म करना, नदियों को सुखाना, जमीन को बंजर बनाना हो गया है। जो लोग गरीबों की बात करते है, विकास नीति पर सवाल खड़ा करते हैं उसे विकास विरोधी करार देकर सीधे बिना संवाद के खारिज कर दिया जाता है। भगतसिंह जिस समाजवादी व्यवस्था को लाना चाहते थे उसमें मुख्य भूमिका किसानों और मजदूरों की मानते थे। मगर आज खेती घाटे का सौदा बन गया है। किसान कर्ज के चक्र में फंस कर हताश, निराश होकर आत्महत्या कर रहे हैं।

सरकार कोरोना काल का उपयोग साम्राज्यवादी एजेंडे को देश पर थोपने के लिए कर रही है। श्रम कानून में परिवर्तन मजदूर विरोधी और कम्पनियों और कारपोरेट को लाभ पहुंचाने के लिए किया है। इसके साथ ही राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को भी बेचने का अहम फैसला किया है। इसमें तेल, कोयला, नागरिक विमानन, बैंक, बीमा आदि शामिल हैं।  

भगतसिंह साम्प्रदायिकता को उतना ही बड़ा दुश्मन मानते थे, जितना साम्राज्यवाद को। भगतसिंह ने जिस ‘नौजवान सभा’ को खडा किया था उसने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया था कि किसी भी धार्मिक संगठन से जुड़े नौजवान को उसमें शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ‘धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और साम्प्रदायिकता हमारी दुश्मन है जिसका हर हालत में विरोध किया जाना चाहिए।‘

आज एक बार फिर देश का साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ रहा है। जो काम कभी अंग्रेजी हुकूमत करती थी वही काम इस समय देश का शासकवर्ग कर रहा है। देश का साम्प्रदायिक वातावरण बिगाड़ने, लोगों को बांटने और शासन करने की साजिशें परवान चढ़ रही हैं। ऐसे में भगतसिंह का साम्प्रदायिकता पर स्पष्ट विचार बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। आजादी के दौर और उसके बाद के वर्षों में जिस दृष्टि, मूल्य, विचार एवं कार्यक्रम पर राष्ट्रीय सहमति थी उसको चुनौती देने वाली और राष्ट्र को विपरीत दिशा में ले जाने वाली कटिबद्ध ताकतें आज हाशिए से केन्द्र में आ गई हैं। ऐसे में भगतसिंह की प्रासंगिकता काफी बढ गई है। समता और न्याय की स्थापना के लिए संघर्षरत लोगों, विशेषकर युवाओं को भगतसिंह की देशभक्ति, साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता के खिलाफ की लड़ाई प्रकाश पुंज की तरह उनका मार्गदर्शन कर सकती हैं। (सप्रेस)

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