डॉ सन्तोष पाटीदार

कोरोना वायरस ने और कुछ किया हो, ना किया हो, उसने हमें पर्यावरण के लगातार बदहाल होते जाने की चेतावनी जरूर दे दी है। क्या इस चेतावनी से हमारी दुनिया कुछ सीख पाएगी? मौजूदा हालातों से तो ऐसा कतई नहीं लगता। जैसे-जैसे कोरोना की समाप्ति के बाद दुनिया ‘खुलती’ जा रही है, वैसे-वैसे हम अपनी ‘कोरोना-पूर्व’ की गतिविधियों को दुगनी रफ्तार से सक्रिय करते जा रहे हैं।

पर्यावरण की तबाही का सीधा सम्बंध कोरोना और इससे पहले आई इस जैसी कई लाइलाज बीमारियों, जंगलों और वन्यजीवों के साथ उनके प्राकृतिक आवासों की तबाही व जंगल की आग, ‘एम्फान’ जैसे समुद्री तूफानों, ग्लेशियर पिघलने आदि से है। पृथ्वी पर बीता वर्ष ऐसी ही प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक व मानवीय उथल-फुथल से भरा था। नतीजतन इस ग्रह पर कुछ ही समय में जीवन विकट हालातों से घिर गया है। 

ऊर्जा की जरूरतें, अंधगति वाले औद्योगिक व इन्फ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेन्ट, बढ़ती आबादी और बेतरतीब विकास के दबाव से सिकुडते प्राकृतिक संसाधन के फेर में इंसान ने खुद के जीवन को ही दांव पर लगा दिया है। ‘समय की दीवार’ पर प्रकृति ने एक बार फिर वर्ष 2020 की आपदाओं की स्याही से प्रलय जैसे हालातों की शुरूआती इबारत लिख दी है। 

बीते बरस की रुदन भरी यादों को दूर छोड़ दुनिया ने महा-विनाशकारी कोरोना वायरस के पुनः उदय के साथ नए साल में प्रवेश किया। पुराने व नए साल के बीच दहलीज़ लांघते हुए विश्व के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष ने प्रकृति के विनाश पर चिंता नहीं जताई। यह जानते हुए भी कि जल, जंगल, जीव व जमीन के प्राकृतिक संतुलन के रिश्ते के साथ ज्यादती ने मानव सभ्यता को पूरी तरह खतरे में डाल दिया है। हरेक देश की सम्पूर्ण प्रगति में आधुनिक विकास का इकोनॉमी आधारित अजेंडा, इकोलॉजी के लिए विनाशकारी खतरा बन चुका है। यह जानते हुए कि इससे दरकती धरती पर उसके खतरनाक परिणामों में से एक, कोरोना संक्रमण के दंश से सर्वशक्तिमान राष्ट्राध्यक्ष भी नहीं बच पा रहे हैं। 

इतना सब होते हुए भी नव-वर्ष के जश्न में कोरोना की जंग से थके-हारे राष्ट्रों व उसके शासनाध्यक्षों ने पश्चाताप तक व्यक्त नहीं किया। ‘दूध का जला, छाँछ भी फूंक-फूंककर पीता है,’ परंतु देश-दुनिया की सरकारें इससे कोई सबक लेती नहीं दिख रहीं। इसके उलट वे प्राकृतिक संसाधनों से भरे वनों, हरे-भरे पहाड़ों, वन्य-जीवों के प्राकृतिक आवासों, नदियोँ, गाँवों, खेत – खलिहानों की बलि लेते ‘विकास’ के एजेण्डे पर ही आगे बढ़ते नजर आए। पर्यावरण के अनेक खतरों से घिरे हमारे देश में विकास का पर्याय बनाए जा रहे विशाल खनन, बांधों के प्रोजेक्ट, हाईवे, निजी निवेश की रेलमपेल के लिए पर्यावरण कानूनों को लचीला किया जा रहा है। जीवन से खिलवाड़ करने वाले विशालकाय प्रोजेक्ट्स को किसी भी तरह स्वीकृति देने के लिये पर्यावरणीय कानूनों को कमजोर बनाने के सरकारी प्रयास अंततः देश का संकट और बढ़ाने वाले हैं। मध्यप्रदेश में खाली खजाने की सरकार भी खेती की उपजाऊ भूमि को खत्म करने वाले बडी पूंजी व बड़े भ्रष्टाचार के निवेश से हाईवे, नदी-जोड़ व गांवों को कमजोर करती शहरीकरण योजनाओं पर जोर दे रही है। 

मानव जाति का दुर्भाग्य है कि तमाम मानव निर्मित प्राकृतिक आपदाओं से जूझने के बावजूद कोई भी सरकार पर्यावरण आधारित, टिकाऊ या सतत विकास की अवधारणा को अंगीकार करने के बारे में विचार तक नहीं कर रही है। सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करते हुए ग्रीन हाऊस इफेक्ट / ग्लोबल वार्मिंग  में अहम रहे अमेरिका में केलिफोर्निया, दक्षिणी व पश्चिमी अमेरिका के साथ अर्जेंटीना व भारतीय उत्तर पूर्वी राज्यों में भीषण जंगल आग की लपटों से झुलसते वन्य जीवों, जानवरों व लोगों को हमने तड़पते व उजड़ते देखा। अमेरिका में लाखों हेक्टेयर जंगल को बंजर बना गई एक आग व इससे बढ़े वातावरणीय तापमान के साथ तबाही मचाते तूफ़ान और ध्रुवीय बर्फ पिघलने से आ रही आपदाएं बहुत कुछ कह रही हैं। वहाँ इनकी तीव्रता व रेकॉर्ड संख्या बीते वर्ष में तुलनात्मक रूप से ज्यादा रही। जलवायु बदलाव से धरती को बचाने के लिए दुनिया के सभी राष्ट्रों द्वारा कार्बन उत्सर्जन को 2050 तक न्यूनतम करने के ‘पेरिस समझौते’ से हटे अमेरिका के नए राष्ट्रपति बिडेन अब पुनःसमझौते को स्वीकार कर रहे हैं। आगे के वर्षों में अमेरिका के प्रयास बाकी दुनिया के साथ किस तरह पर्यावरणीय न्याय करते हैं, यह जानना बहुत अहम होगा।

यह जानते हुए कि पिछले 12 महीने दुनियाभर में जीवित रहने के लिए सबसे घातक साबित हुए हैं। टिड्डियों का हमला, भूकंप, बाढ़, भूस्खलन के साथ निश्चित रूप से अब भी कोरोनो वायरस जैसी महामारी का सितम थमने का नाम नहीं ले रहा है। यही हाल रहे तो सन 2050 तक हालात भयावह होते चले जायेगे।

भारत की स्थिति भी चिंताजनक है। वर्ष 2019 व 2020 में देश ने प्राकृतिक आपदाओं की बड़ी कीमत अदा की है। इस अवधि में जल प्रलय वाले समुद्री तूफानों की आवृति के साथ तीव्रता भी बढ़ी है। अकेले ‘एम्फान’ चक्रवात से देश व पड़ोसी बंगलादेश को 15 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, यह दुनिया की सबसे मंहगी प्राकृतिक आपदा रही। उत्तर भारत, खासकर बिहार में एक-डेढ बरस पहले प्रचण्ड गरमी करीब 185 लोगों को लील गई थी। देश में गरमी के दिन व तापमान दोनों में वृद्धि हो रही है। कोरोना लाकडाउन में आग उगलती गर्मी में शहरों से पैदल पलायन करते मजदूरों को गर्म लपटों से दम तोड़ते सबने देखा था। बीते वर्ष के पहले छह महीनों में वैश्विक स्तर पर कम-से-कम 207 प्राकृतिक आपदाएँ दर्ज की गईं थीं। यह 185 आपदाओं के 21 वीं सदी के दो दशकों (2000-2019) के औसत से अधिक है। 

‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका की एक रिपोर्ट  बताती है कि ‘सन 2020 के पहले छह माह में आई  वैश्विक आपदाओं से 75 बिलियन डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ। यह 1980 के दशक के दौरान हुए करीब 78 बिलियन डॉलर के औसत नुकसान के करीब है। जनवरी से जून के बीच आई इन आपदाओं में से लगभग 92 प्रतिशत का वास्ता मौसम के उग्र रूप के साथ  प्राकृतिक असंतुलन से था।‘  

मं‍हगा चक्रवात

रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 15 बिलियन डॉलर के आर्थिक नुकसान के साथ, बंगाल की खाड़ी का चक्रवात ‘एम्फन,’ दुनिया का सबसे महंगा तूफान साबित हुआ है। यह उन 20 आपदाओं में से एक है जिनकी कीमत उस साल अरबों रुपये में थी। इस चक्रवात ने मई 2020 में बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश के बड़े तटीय इलाकों में तबाही मचाई थी। यह 1999 के बाद से इस क्षेत्र का तीसरा सबसे भयंकर तूफान था। इसके कारण पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तटीय जिलों को जल प्रलय के रुप में जलवायु परिवर्तन का भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। 

सन 2020 में प्राकृतिक प्रकोप की कुल संख्या 20 में से दो भूकम्पीय आपदाओं को छोड़ बाकी 18 का सम्बंध मौसम के बदलते मिजाज से है, जबकि इन बिलियन-डॉलर के भयंकर नुकसान वाले प्राकृतिक प्रकोप में से 12 ने अमेरिका को दहलाया था। दो एशियाई देशों, भारत और चीन  को मौसम संबंधी आपदाओं के कारण 20 बिलियन डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसके बदले खरबों रुपये की बीमा राशि का भुगतान हुआ, वह अलग।

वैश्विक स्तर पर 2,200 मौतें

प्राकृतिक आपदाओं के सामने दुनिया का अर्थतंत्र देखते-देखते घुटनों पर आ जाता है। बीते बरस 2020 की पहली छमाही के दौरान बाढ़, चक्रवात, सूखा – गर्मी आदि से लगभग 2,200 मौतें हुईं। इसमें से लगभग 60 प्रतिशत मौतें बाढ़ से हुईं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 1,002 लोगों को जल प्रलय लील गया। 

प्रकृति का गुस्सा थमने वाला नहीं

‘जलवायु परिवर्तन की अंतरदेशीय पैनल’ (आईपीसीसी) ने दुनिया को चेतावनी देते हुए कहा है कि जलवायु परिवर्तन  से उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के और अधिक तीव्र होने की संभावना है। दुनिया में औद्योगिकरण युग के बाद से अब तक वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस वृद्धि का अनुमान है। इससे पृथ्वी पर जीवन हर तरह से प्रभावित हो रहा है। धरती गर्म होने से उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तीव्रता में एक से 10 प्रतिशत की वृद्धि अनुमानित है। इसका मतलब यह है कि आने वाले चक्रवातों की विनाशकारी क्षमता में और भी अधिक वृद्धि की संभावना है। कुछ इसी तरह के चक्रवाती तूफान कोरोना जैसी महामारी के रूप में छिपे हैं। समय रहते मानव समाज व सरकारें प्रकृति की शरण में चले जायें तो अभयदान शायद मिल जाये। जाने-माने पर्यावरण विद् डॉ. अनिल जोशी कहते हैं ‘जीडीपी’ नहीं ‘जीईपी’ (‘ग्रास इकोलॉजीकल प्रोडक्शन’) प्रगति का पैमाना होना चाहिये। (सप्रेस) 

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