11 सितंबर : विनोबा जयंती पर विशेष

कुमार सिद्धार्थ

हर महापुरूष का सोचने-विचारने और चिंतन का अपने निराला ढंग होता है। अपने चिंतन का जो नवनीत अपने जीवनकाल में वे समय-समय पर समाज का परोसते हैं-वह समाज-जीवन में चल रहे व्यवहार के अनुभवों का निचोड़ होता है। देश की ऋषि परम्परा में ऐसे एक विचार-मानव हुए आचार्य विनोबा भावे। यहां उनके प्रवचनों से कुछ अंश संकलित किऐ गए हैं जिससे विनोबाजी की अभिनव विचार सरणी की झलक मिलती है।

आज एक भी राष्ट्र ऐसा नहीं दिखता है कि जहां लोकशाही उसके मूल अर्थ में हो। विज्ञान-युग में ऐसा एक भी राष्ट्र नहीं हो सकेगा। क्योंकि चाहे जितनी राजनीति सुधारने की बात करो, तो भी सामान्य देश के पास अगर विशेष  प्रकार के शस्त्र रखने हों, तो उसे अपना सब कुछ छोड़कर शस्त्र की झंझट में पड़ना पड़ता है और उसके अपने हाथ में कुछ नहीं रहता है। इसलिए अपने देश  का आयोजन हम स्वयं नहीं करते हैं और दूसरे देश  के पास से करवाने हैं। हम कोई खर्च करते हैं या नहीं करते हैं, अथवा किस तरह करते हैं-कम करते हैं या ज्यादा, यह सार हमारे हाथ में नहीं रहता है। दूसरे देशों के हाथ में है। अमेरिका आज समर्थ है, फिर भी इसका संयोजन रूस की ओर देखकर होता है और रूस समर्थ है, फिर भी उसका संयोजन अमेरिका की ओर देखकर होता है। अपना संयोजन स्वयं करें, ऐसा आज कोई देश नहीं है, इसलिए सच्चे अर्थ में आज लोकशाही कहीं भी नहीं है।

इसका उपाय लोकनीति की स्थापना के बिना नहीं है। परंतु सवाल यह पूछा जाता है कि जब तक लोकनीति की स्थापना नहीं होगी, तब तक बीच के समय में क्या करेंगे? कल के और आनेवाले कल के बीच आज का दिन यह संक्रमण काल है। बीता हुए क्षण और आनेवाले के बीच में यह क्षण एक संक्रमण काल है इसलिए हमेशा सबके लिए संक्रमण काल है ही। संक्रमण काल के नाम से मूल चीज को दूर करने की वृत्ति मनुष्य लेगा, तो जिस तरह धर्म निकम्मे हो गए है, उसी तरह अहिंसा का विचार भी निकम्मा हो जाएगा।

सरकार के ध्यान में शायद यह बात आ गई है कि केवल सरकार की शक्ति से देश  का काम नहीं चलेगा। देश  में लोकशक्ति खड़ी करनी चाहिए। वह लोकश क्ति किस तरह खड़ी होगी, कौन खड़ी कर सकता है, यह सवाल है लोक-शक्ति सरकार के नियंत्रण से हुक्म से या कानून से पैदा होनेवाली नहीं है। आज सरकार कोशिश करती है कि गांव-गांव में ग्राम पंचायत  हो और ग्राम-पंचायत को सरकार कुछ अधिकार दे। सरकार कहती है कि ग्राम-पंचायत अगर ज्यादा अच्छी चलेगी और उससे अगर लोगों की योग्यता बढ़ेगी तो हम ग्राम-पंचायत को ज्यादा अधिकार देंगे। मैं पूछता हूं कि आप कौन है अधिकार देने वाले? इसका अर्थ यह है कि आज जो ग्राम-पंचायत है, वह गांव में से खड़ी नहीं होती है, सरकार की तरफ से खड़ी होती है और वह ऊपर-ऊपर की प्रेरणा से होती है। याने सत्ता का बंटवारा होता है। यह सत्ता की ही संस्था है, सेवा की संस्था नहीं है। सत्ता का बंटवारा करके किसी मनुष्य के हाथ में सरकार सत्ता देती है और गांव का नेतृत्व खड़ा करना चाहती है। गांव का नेतृत्व गांव से ही होना चाहिए, ऊपर से नहीं।

लोक-शक्ति जहां एक अंक रहेगी, वहां सरकार शक्ति शून्य। इस तरह एक और शून्य मिलकर दस होंगे। यदि अकेली लोक-शक्ति काम करे तो एक अंक होगा, किंतु केवल सरकार-शक्ति से काम किया जाए तो काम भी शून्य ही होगा। बिना अंक के शून्य की कीमत शून्य होती है, वैसे ही लोकशक्ति के बिना सरकार की शक्ति शून्य ही होगी। आज भारत में सरकार शक्ति लगभग शून्य होने की स्थिति में आ पहुंची है।

दोषों का निवारण करते समय हम कभी-कभी व्यर्थ ही गुणों पर भी प्रहार कर बैठते हैं। कितनी ही बार दोष  गुणश्रित हुआ करते हैं। ऐसे अवसर पर दोष को गुण से अलग कर फिर उस पर प्रहार करना चाहिए। अन्यथा यदि हम गुणों पर भी प्रहार करेंगे तो वे तो मिटने वाले हैं ही नहीं, दोष को भी अपने सहवास से मिटने नहीं देंगे जैसे कि सर्प-सत्र में इंद्र ने तक्षक को बचा लिया। इसलिए गुण-दोश का विश्‍लेषण कर पुराने मूल्यों का अच्छा अंश ग्रहण करना चाहिए और बुरे अंश पर प्रहार करना चाहिए, तभी बुरे अंश का निवारण हो सकेगा। बापू इसी को अहिंसक-पद्धति कहते थे।

आज प्रजा इतनी दीन, पराधीन और निःसत्व हो गई है कि वह सोचती है कि हम कुछ नहीं कर सकते है, जो कुछ होगा, वह सरकार के मार्फत ही होगा। भगवान का जितना नाम नहीं लिया जाता उतना सरकार का नाम लिया जात है। सरकार ने आज भगवान का स्थान ले लिया है। हमारे लिए एक ही धंधा रह गया है। सरकार अच्छा काम करती है तो उसकी स्तुति करना और अच्छा का नहीं करती तो उसकी निंदा करना। सरकार की स्तुति और निंदा के सिवाय हमार दूसरा धंधा ही नहीं है।

गांव वाले श्रम करते हैं, फिर भी आज श्रम की प्रतिष्ठा नहीं है। किसान अपने लड़के को पढ़ना चाहता है। आज उसे स्वयं खेती का काम करना पड़ता है, परंतु वह सोचता है कि जो काम वह स्वयं करता है, उससे उसका लड़का मुक्त हो जाए तो अच्छा है। शहरवालों में तो श्रम की प्रतिष्ठा है ही नहीं, श्रम करनेवालों में भी श्रम की प्रतिष्ठा नहीं है। इस तरह सारा भारत एक भयानक अवस्था में है।

विज्ञान-युग में मनुष्य क्षोभ से काम में नहीं लग सकता है। सार्वजनिक काम हो, घर का काम हो या लष्कर का काम हो-सबमें शांत मन से काम करना चाहिए,ऐसी आवश्‍यकता आज के जमाने की है। कुटनीतिज्ञ आमने-सामने बैठकर अगर चिढ़कर बात करेंगे तो वे कूटनीतिज्ञ नहीं। मेरे जैसे साधक को भी अगर क्षोभ आ जाएगा तो सामने वाले को भी गुस्सा आ जाएगा। इसलिए आज खाजगी या सार्वजनिक, हिंसक या अहिंसक किसी भी क्षेत्र में, किसी भी व्यवहार में क्षोभ को अवकाश  नहीं। अगर क्षोभ का उपयोग होगा तो हम हार भी खाएंगे और मार भी।

नाक में सांस चलती है तो मनुष्य जीता है, यह कहना ठीक नहीं है। लुहार के भाते में भी सांस चलती है, जैसे हम रोज खाते हैं और उससे खून में रोज नया-नया रस आता है, उसी तरह ज्ञान पाने की क्रिया रोज चलनी चाहिए। रोज खाने से और सोने से शरीर में ताजगी रहती है। उसी तरह जिस दिन हमने ज्ञान नहीं पाया, वह दिन नीरस, शुष्क हो जाएगा। भगवान ने ज्ञान सुनने के लिए कान दिए है, पढ़ने के लिए, देखने के लिए आंख दी है और चिंतन, मनन करने के लिए मन दिया है।

स्वराज्यप्राप्ति के बाद आज देश  में एक बहुत बड़ा अज्ञान, गलतफहमी यह फैल गई है कि सत्ता के द्वारा ही कोई भी सेवा हो सकती है। इसलिए सभी दल सत्ता हथियाने के लिए ही जुटे हैं। एक सत्ताधारी पक्ष बना है तो दूसरे सत्ताभिलाषी। इस तरह कभी सत्ता के पीछे ही पड़े हुए हैं। कांग्रेस वाले भी लोगों के बीच पहुंचकर उनके दुख सुनते और उन्हें सरकार तक पहुंचाकर जहां जब बनता है, राहत पहुंचाने का यत्न करते हैं। ये उभयान्वयी अव्यय जैसे हैं। किंतु उनका भी ध्यान इस ओर नहीं जाता कि जनता के बीच स्वतंत्र कार्य खड़ा किया जाए। विरोधी दल आ-जाकर सत्ताभिलाषी होते ही हैं। अतएव जनता के बीच सरकार की खामियां रखने, उनकी निदा करने और आगामी चुनावों में अपने को चुनने की सलाह देने के सिवा उनका कुछ काम ही नहीं रहता। फलस्वरूप लोक-मानस क्षुब्ध हो उठता है। उसमें तनिक भी श्रद्धा नहीं रह पाती। उसमें थोड़ी सी भी स्थिरता और निष्ठा नहीं पाई जाती। परिणामस्वरूप आज हममें पहले से अधिक निष्क्रियता दिखने लगी है। (सप्रेस)

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