
सार्वजनिक सम्पत्ति के निजीकरण की हुलफुलाहट में इन दिनों ठेका-प्रथा जारी है। हवाई-अड्डों, रेलवे-स्टेशनों, सडकों, कारखानों आदि को फिलहाल ठेके पर निजी कंपनियों को सौंपने के पीछे की नीयत आखिर निजीकरण नहीं तो और क्या है? ‘सरकार का काम व्यापार-व्यवसाय करना नहीं है’- के नीति वाक्य के पीछे अब देश की अकूत सम्पत्ति को, जमीन की तरह निजी मालिकों को सौंपा जा रहा है।
बाज़ी बिछी हुई है। दोनों तरफ खिलाड़ी बैठे हैं। एक-के-बाद-दूसरी चाल चली जा रही है। खरीददार अंदाज कर रहा है कि बोली ठीक तो लग रही है? एक चाल और सारा माल अपना ऐसा कैसे हो? शकुनी मामा की पौ बारह है, ठीक से तमाशा नहीं हुआ तो फायदा क्या ! भरी सभा में कोई कह बैठे कि सब छल हो रहा है तो? इसलिए पांसा फेंकने का मौक़ा दोनों तरफ़ दिया जा रहा है, लेकिन जो साफ़ दिख रहा है कि सारे नियम एकतरफा बनाए गए हैं।
पहला पांसा फेंका गया था – 2015 में, विकास के नाम पर ज़मीन अधिग्रहण का! यह नाटक बरसों से चला आ रहा था। अंग्रेज़ों ने कानून 1894 में बनाए थे। सौ, सवा-सौ साल तक जब उसका सारा रस चूस उससे और रस निकालने की संभावना ख़त्म होने लगी तब सरकारों ने 2013 में यह कानून बदला।वैश्वीकरण के रास्ते अब इनको अपने हित का नया कानून चाहिए था। शुरुआत में 2013 के नए क़ानून में अधिग्रहण के पहले उचित मुआवज़े का हक़, स्थानीय लोगों की रज़ामंदी लेना और ज़मीन अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव का अध्ययन जैसी बातें जोड़ी गयीं, जल-जंगल-ज़मीन पर आदिवासियों के हक़ को भी मंज़ूर किया गया ताकि न्याय का भ्रम बना रहे, लेकिन इरादा साफ था कि आगे बदलाव होंगे।
तब की हो या अब की, निजी पैसे पर चलने वाली पार्टियां यह समझाती हैं कि जब तक ज़मीन और प्राकृतिक संसाधान सरकार के या निजी हाथों में नहीं आते, तब तक विकास संभव नहीं है। इसलिए 2015 में नया क़ानून पास हुआ जिसमें से वे सारी बातें हटाई गईं जो इस असीमित लूट को रोक रही थीं। विपक्ष ने विरोध किया, तब शकुनी मामा के लिए दिल्ली नई-नई थी। बेचारे झुक गए ! फिर उन विवादास्पद मुद्दों को 2015 के नये कानून से हटाया गया। कौन भारतीय भूल सकता है कि केवल पांच गांव भर जमीन न देने के कारण महाभारत हुआ था ! शायद इसलिए सरकार पीछे हट गई, लेकिन नए क़ानून में एक छेद रखा गया। सुरक्षा, सैन्य-सुरक्षा, गांव में विकास या औद्योगिक कॉरिडोर के नाम पर ज़मीन अधिग्रहण पर कोई नियम लागू नहीं होगा! पहले ऐसा था कि उपजाऊ ज़मीन, जिसमें एक से ज्यादा फसलें लगती थीं, उनको सरकार नहीं ले सकती थी। अब आप सरकार पर भी प्रतिबंध लगाएंगे? जिस सरकार पर कोई प्रतिबंध लगाया जा सके, वह सरकार ही कैसे? इसलिए 2015 में ज़मीन अधिग्रहण का नया क़ानून बना। अब सरकार खुद भू-माफिया बन कर सामने आ गई।
फिर एक पांसा 2019 में फेंका गया। इस बार सरकार पहले से भी ज़्यादा बहुमत से जीत गई। अब तो कौन रोकता और कैसे? ‘सैयां भये कोतवाल. .’ वाला मामला बना ! लेकिन हम तो दर्शक हैं, हमने 1894 भी देखा, 1991 और 2013 भी ! अब 2021 भी देख रहे हैं ! रोड के नाम पर, सुरक्षा के नाम पर, ग्रामीण विकास और औद्योगिक कोरिडोर की अनंत योजनाओं के नाम पर ज़मीन का अंधाधुंध अधिग्रहण हुआ। कोई निजी कंपनी जैसा करने से पहले दस बार सोचती, वैसा करते हुए सरकार पलक भी नहीं झपकाती है। जनता का ग़ुस्सा बिकता भी है, डरता भी है। सो अपनी सेना, अपनी पुलिस और अपना कानून सब काम आसान बना देता है – आसान नहीं, बहुत आसान !
अब सबसे नया पासा फेंका है, वित्तमंत्री मैडम सीतारामन ने। वे देश की सम्पत्ति का पूंजीकरण कर रही हैं। वे बार-बार समझा रही हैं कि ज़मीन हो या कम्पनी, बिक कुछ भी नहीं रहा। केवल कार्य कुशलता बढ़े, इसके लिए निजी क्षेत्र को सार्वजनिक माल किराए पर दिया जा रहा है। जितने प्रोजेक्टों का चयन इस काम के लिए हुआ है, उसका 66 % रोड, रेल और बिजली के उपक्रम हैं। बाकी खदान, बंदरगाह, टेलिफ़ोन, विमान, वाहन जैसे उपक्रम तो हैं ही। अब आप हिसाब लगाइए कि आपकी कितनी ज़मीन ऊपर लिखे गए उपक्रमों के तहत सरकार ने पिछले 6 सालों में अधिग्रहीत की है? यहीं आकर सारा खेल खुल जाता है। बाकी सब धोखा है, दरअसल खेल है ज़मीन हड़पने का। जमीन वह अक्षय दौलत है जिस पर सारी दौलतें खड़ी हैं। जमीन बढ़ नहीं सकती, सो इसकी कीमत कभी घट नहीं सकती ! तो ज़मीन की मालिकी भले सरकार की रहे, उस पर धंधा निजी कंपनियां करेंगी।
मैं एक बार नादानी में मान लेती हूं कि सरकार ऐसी कोई दलाली नहीं कर रही। तो सरकार क्या कर रही है? सरकार निजी कंपनियों को कालीन बिछाकर बुला रही है कि आइए, मुनाफा कमाइए और उसका एक हिस्सा हमें भी दे जाइए। सपना यही तो है न कि अगले चार साल में सरकार 6 लाख करोड़ रूपए कमाएगी। तो भई, अगले चार साल इतने रुपए सरकार को देने के लिए कंपनी को अगले 30 साल की अपनी कमाई का नक़्शा बनाना तो पड़ेगा न !
सच तो यह है कि बैंकों का निजीकरण, एयर इंडिया की बिकवाली ऐसे कितने ही सरकारी प्रकल्प हैं जिनको कोई खरीददार नहीं मिल रहा। निवेश के नाम पर भारत से ही चुराया टैक्स-चोरी का पैसा भारत आता है और सरकार ताली बजाती है कि हमें देखकर निवेशक आ रहे हैं। विमान हो, गैस हो, बंदरगाह हो या कि टेलिफ़ोन हो अपने देश में खिलाड़ी बचे ही कितने हैं? एक-एक कर सारी कम्पनियां तो दिवालिया हो गयीं हैं! ऐसे माहौल में कुछ गिनी-चुनी कंपनियां ही हैं जो इस पूरे खेल का लाभ लेंगी। ऐसे खिलाड़ियों के नाम देश की हर गली में, हर बच्चा जानता है।
चौसर के इस खेल का क्लाईमेक्स वर्ष 2024 के चुनावों के पहले आना है। तब तक धीरज रखिए। जनता द्रौपदी है जिसका चीरहरण होता ही रहता है। (सप्रेस)