
पृथ्वी पर चौबीस घंटे उल्का पिंड गिरते रहते हैं लेकिन उनका आकार बड़ा नहीं होता। पिछले सप्ताह मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ में हुए मेटोर शॉवर समूह में था, जो आकाश में दिखाई दिया। उल्कापिंड पुच्छल तारे के रूप में होते है। ये जब गिरते हैं तो इनकी चमक इतनी ज्यादा होती है कि 200 से 300 किलोमीटर के दायरे के लोग भी आसमान में इसे देखा जा सकता है। गिरे पिंड के बारे में अभी भले ही कोई एक राय न हो, परंतु अंतरिक्ष में बढ़ रहे कचरे से पैदा खतरों पर गंभीरता से वैश्विक स्तर पर विचार किया जाना जरूरी है।
हाल ही में 02 अप्रैल शनिवार की रात लगभग आठ बजे के आसपास म.प्र. एवं महाराष्ट्र के कई हिस्सों में लोगों ने तेज रोशनी के साथ गिरते पिंडों की खगोलिय घटना देखी। महाराष्ट्र में नागपुर के पास चन्द्रपुर में ये जलते पिंड गिरे जो धातु के बताए गये। एस्ट्रोफिजिफस सेंटर के खगोल वैज्ञानिक डा. मेकडावल ने इन्हें किसी चीज के राकेट का टूटा हिस्सा बताया जबकि नागपुर के ही स्काय वाच ग्रुप के अध्यक्ष सुरेश चौपड़ा ने इसे किसी देश का सेटेलाइट बताया जो गिरा या गिराया गया। गिरे पिंड के बारे में अभी भले ही कोई एक राय न हो, परंतु अंतरिक्ष में बढ़ रहे कचरे से पैदा खतरों पर गंभीरता से वैश्विक स्तर पर विचार किया जाना जरूरी है।

अंतरिक्ष में प्राकृतिक कचरा
अंतरिक्ष में प्राकृतिक कचरा पैदा होने का इतिहास तो काफी पुराना है। परंतु मानव द्वारा कचरा फैलाने का 6-7 दशक पुराना है। भारतीय मूल की कल्पना चावला एवं छः अन्य अंतरिक्ष यात्रियों के साथ जब कोलम्बिया यान टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया था, तब इस दुर्घटना का एक संभाविता कारण अंतरिक्ष में फैला कचरा भी बताया गया था। अंतरिक्ष में फैले कचरे को space Junk या space debris भी कहते है। कुछ इसे अंतरिक्ष प्रदूषण भी मानते है। अंतरिक्ष में प्रवेश करने वाला मानव द्वारा बनाया यान स्पूतनिक था जो रूस द्वारा 04 अक्टूबर 1957 को छोड़ा गया था। इसके बाद तो अंतरिक्ष में यान छोड़ने की एक होड़ सी लग गयी। वर्तमान में शिक्षा सुरक्षा एवं संचार के लिए बड़ी संख्या में उपग्रह विभिन्न देशों द्वारा छोड़े जा रहे है। पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर निकलते ही अब चारों और फैला कचरा ही दिखायी देता है। इस कचरे में अपनी उम्र पूरी कर चुके उपग्रह टूटे फूटे राकेट, बेटरी एवं टकराव से बिखरे धातुओं के टुकड़े प्रमुख है। वैसे अमेरिका की संस्था एअरडिफेंस कमान अंतरिक्ष को वस्तुओं का हिसाब रखती है। परंतु फिर भी अलग अलग संस्थाओं या एजेंसियों की गणना में भिन्नता मिलती है।
दो दशक में लाखों किलोग्राम कचरा अंतरिक्ष में फेंका
अमेरिकी संस्था नासा (नेशनल एरोनाटिक एंड स्पेस एडयिनिस्ट्रेशन) ने ही 20 वर्ष पूर्व एक अध्ययन में बताया था कि ग्यारह लाख किलोग्राम कचरा अंतरिक्ष से फेंका जा चुका है। चेक गणराज्य में प्राग स्थित एकेडमी आफ साइंस के अंतरिक्ष संस्थान ने वर्ष 2005 में बताया था कि अंतरिक्ष में 5000 टन कचरा मौजूद है। इस अध्ययन को नासा ने सही बताते हुए यह कहा था कि यह कचरा तेज गति (1800 किलो मीटर प्रति घंटा) से घूम रहा है। यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने अंतरिक्ष कचरे की मात्रा 7000 टन बतलायी।
एक अनुमान अनुसार 23 हजार मानव निर्मित उपग्रह अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे है एवं यह संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसके साथ ही धातुओं या अन्य सामग्री के अलग अलग आकार प्रकार के अरबों टुकड़े भी घूम रहे हैं। जो उपग्रहों की दुर्घटना या नष्ट होने से बने है।
यह संभावना भी बतायी जा रही है अंतरिक्ष में फैला यह कचरा वायुमंडल को प्रभावित कर मौसम में बदलाव भी ला सकता है। इससे मौसम की अप्रत्याशित घटनाएं बढ़ सकती है। साथ ही कचरे के टुकड़ों के तेज गति से घूमने से नए छोड़े गए उपग्रह दुर्घटनाग्रस्त या नष्ट हो सकते है। खगोलशास्त्रियों द्वारा ग्रहों, नक्षत्रों एवं निहारिकाओं के अध्ययन हेतु लिये जाने वाले चित्रों में इन टुकड़ों की छवि आने से सही स्थिति के आंकलन में गडबड हो जाती है।
प्राकृतिक उल्फापिंड एवं उपग्रहों में फर्क
प्राकृतिक उल्फापिंड एवं उपग्रहों के इन टुकड़ों में प्रमुख अंतर यह है कि प्राकृतिक उल्फापिंड पृथ्वी पर गिरते समय तेज गति एवं वायुमंडलीय दर्पण से गर्म होकर पृथ्वी की सतह पर पहुंचने के पूर्व जलकर समाप्त हो जाते है। उपग्रहों के धातुओं के टुकड़े अनंतकाल तक अंतरिक्ष में नहीं रहते है। कई कारणों से जब इनकी गति कम हो जाती है। तो ये गुरूत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी की ओर जाते है एवं वायुमंडलीय घर्षण से समाप्त न होकर एक आग के गोले में बदल जाते है। ये गोले पृथ्वी सतह पर पहुंचकर कई प्रकार की तबाही मचा सकते है। दुनियां के कई देशों में इस प्रकार के गोलों के गिरने से जनधन की हानि हुई है।
पृथ्वी पर ठोस कचरा प्रबंधन हेतु विभिन्न देशों ने अपने अपने नियम कानून बनाये है परंतु अंतरिक्ष में फैल रहे कचरे के लिए कोई भी स्थापित नियम कानून नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ को इस संदर्भ में कोई पहल वैश्विक स्तर पर करना चाहिये। वैसे इस समस्या से निजात पाने हेतु कई सुझाव भी दिये गये है। जैसे ऐसे उपग्रह छोडे जाए जो निश्चित समय बाद लौअ आए, किसी चुम्बकीय प्रणाली से धातुओं के टुकड़ों को एकत्र कर वापस लाना एवं पुर्नउपयोग करना एवं लेसट पद्धति या अन्य किसी तकनिक से अंतरिक्ष कचरे को वहीं नष्ट करना। विभिन्न देशों द्वारा यदि इस संबंध में ठोस प्रयास नहीं किए जाते है तो भविष्य में यह समस्या भी ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के समान गंभीर रूप ले लेगी।(सप्रेस)