
इन दिनों दुनियाभर को हलाकान करने वाले दो भीषण युद्धों में से एक,इजरायल और मध्य-पूर्व के देशों का है। इजरायल, जिसने हिटलर के हाथों अभी पिछली सदी में ही मानव इतिहास की भीषणतम त्रासदी झेली है,एक मदमस्त गुण्डे की तरह अपने चारों तरफ बसे फिलिस्तीनी,अरब मुल्कों को नेस्त-नाबूद करने में लगा है। क्या है, इस जबरिया युद्ध की पृष्ठभूमि? बता रहे हैं, अमित कोहली।
इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच का संघर्ष एक जटिल और गहन इतिहास पर आधारित है, जो 20वीं सदी के पूर्वार्ध में शुरू होता है। इस संघर्ष की जड़ें कई महत्वपूर्ण घटनाओं और ऐतिहासिक परिवर्तनों में निहित हैं। 19वीं सदी के अन्त और 20 वीं सदी की शुरुआत में ‘यहूदी पुनर्स्थापन आन्दोलन’ (झिओनिज्म) ने जन्म लिया, जिसका उद्देश्य यहूदियों के लिए एक राष्ट्र और पितृभूमि की स्थापना करना था। यह आन्दोलन 1897 में थियोडोर हर्ज़ल द्वारा आयोजित प्रथम यहूदी कांग्रेस के साथ आधिकारिक रूप से शुरू हुआ। यहूदियों ने अपने ऐतिहासिक और धार्मिक सम्बन्धों के आधार पर फिलिस्तीन की भूमि पर दावा किया, जिसे वे अपनी प्राचीन पितृभूमि मानते थे।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1917 में, ब्रिटिश सरकार ने ‘बेल्फोर घोषणा’ जारी की, जिसमें यहूदियों के लिए फिलिस्तीन में एक राष्ट्र की स्थापना का समर्थन किया गया। इस घोषणा ने अरबों के बीच व्यापक असन्तोष उत्पन्न किया, जिन्होंने इस भूमि को अपनी मातृभूमि के रूप में देखा और यहूदियों के बढ़ते दखल की निन्दा की। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ‘लीग ऑफ नेशंस’ ने फिलिस्तीन को ‘ब्रिटिश मैण्डेट’ के रूप में सौंपा। इस अवधि में ‘झिओनिज्म’ ने गति पकड़ी और यहूदियों की संख्या में वृद्धि हुई। फलस्वरूप, अरब-यहूदी तनाव बढ़ने लगा और दोनों समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष होने लगे। 1929 और 1936-1939 के ‘अरब विद्रोह’ इसी तनाव का परिणाम थे, जिसमें कई लोग मारे गए और समुदायों के बीच दरार बढ़ी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1947 में, ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने फिलिस्तीन को दो राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा – एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य। यह योजना यहूदियों द्वारा स्वीकार की गई, लेकिन अरबों ने इसे अस्वीकार कर दिया। 14 मई 1948 को इज़रायल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, जिसके परिणामस्वरूप अरब-इज़रायल युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में इज़रायल ने अपनी सीमाओं का विस्तार किया और लगभग 750,000 फिलिस्तीनी विस्थापित हो गए, जिसे ‘नाकबा’ (आपदा) के नाम से जाना जाता है। 1967 में हुए छह दिवसीय युद्ध में, इज़रायल ने ‘वेस्ट बैंक,’ ‘गज़ा पट्टी’ और पूर्वी येरुशलम पर कब्ज़ा कर लिया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप, फिलिस्तीनी लोगों के लिए स्थिति और भी कठिन हो गई।
इस कब्जे के बाद, इज़रायल ने ‘वेस्ट बैंक’ और ‘गज़ा पट्टी’ में यहूदी बस्तियों का निर्माण शुरू किया जिससे और अधिक तनाव और हिंसा उत्पन्न हुई। 1987 में फिलिस्तीनी क्षेत्रों में असंतोष ने ‘प्रथम इंतिफादा’ (विद्रोह) का रूप लिया। इस विद्रोह में फिलिस्तीनी नागरिकों ने इज़रायली कब्ज़े के खिलाफ प्रदर्शन और विरोध किया। ‘इंतिफादा’ ने वैश्विक समुदाय का ध्यान फिलिस्तीनी मुद्दों की ओर खींचा और इस्राइल और फिलिस्तीनी नेताओं के बीच बातचीत की दिशा में पहला कदम बढ़ाया। 1993 में ‘ओस्लो (नार्वे) समझौता’ एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मान्यता दी और दो-राज्य समाधान की दिशा में काम करने का संकल्प लिया। इस समझौते के तहत ‘फिलिस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण’ यानि फिलिस्तीन राज्य की स्थापना हुई और ‘वेस्ट बैंक’ और ‘गज़ा पट्टी’ के कुछ हिस्सों में स्वशासन की शुरुआत हुई। हालाँकि, इस समझौते के बावजूद, हिंसा और संघर्ष जारी रहे और स्थायी शान्ति का सपना अधूरा ही रह गया।
वर्ष 2000 में ‘दूसरा इंतिफादा’ शुरू हुआ जो पहले से भी अधिक हिंसक था। इस विद्रोह के दौरान, हज़ारों लोग मारे गए और शान्ति प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न हुआ। 2005 में इज़रायल ने ‘गज़ा पट्टी’ से अपनी सेना हटा ली, लेकिन ‘हमास’ के सत्ता में आने के बाद ‘गज़ा पट्टी’ पर कड़ी घेराबन्दी लगा दी गई। वर्तमान संघर्ष की जड़ें 2005 में ‘गज़ा’ से इज़रायली सेना की वापसी और 2006 में ‘हमास’ के सत्ता में आने के बाद की घटनाओं में हैं। ‘हमास’ जो एक फिलिस्तीनी इस्लामिक संगठन है और जिसे इज़रायल और कई पश्चिमी देश आतंकवादी संगठन मानते हैं, ने ‘गज़ा’ पर नियंत्रण प्राप्त किया। इसके बाद से, इज़रायल और ‘हमास’ के बीच कई संघर्ष और युद्ध हो चुके हैं, जिसमें हज़ारों नागरिकों की मौतें हुई हैं और अनगिनत लोग बेघर हुए हैं।
विभिन्न मंचों पर इस्राइल और फिलिस्तीन के बीच शान्ति स्थापित करने के कई प्रयास किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रयास 1993 में ‘ओस्लो समझौता’ था, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मान्यता दी थी और ‘द्विराष्ट्र समाधान’ की दिशा में काम करने का संकल्प लिया था। हालाँकि, यह प्रयास असफल रहा और संघर्ष जारी रहा। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ,’ ‘यूरोपियन यूनियन’ और विभिन्न देशों ने शान्ति वार्ताओं और प्रयासों का समर्थन किया है, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है। संघर्ष की जटिलता, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ और राजनीतिक अस्थिरता ने शान्ति प्रक्रिया को बाधित किया है।
फिलिस्तीनी जनता के दृष्टिकोण से इज़रायल के कार्य अन्यायपूर्ण और आक्रामक हैं। भूमि पर कब्ज़ा, अवैध बस्तियों का निर्माण और नागरिक अधिकारों का उल्लंघन उनके लिए गम्भीर चिन्ताएँ हैं। ‘गज़ा पट्टी’ की घेराबन्दी ने वहाँ के लोगों के जीवन को अत्यन्त कठिन बना दिया है, जहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी और बेरोज़गारी की उच्च दर है। ‘हमास’ और अन्य फिलिस्तीनी गुटों ने हथियारबन्द संघर्ष का रास्ता अपनाया है, लेकिन कई नागरिक इस्राइली नीतियों के खिलाफ शान्तिपूर्ण प्रतिरोध का समर्थन करते हैं। इज़रायली बमबारी और सैन्य कार्यवाहियों में फिलिस्तीनी नागरिकों की मौतें और सम्पत्ति का विनाश जारी है, जो उनके लिए अन्याय और पीड़ा का प्रतीक है।
यासिर अराफात के नेतृत्व में ‘फिलिस्तीन मुक्ति संगठन’ (पीएलओ) फिलिस्तीनी राष्ट्रीय आन्दोलन में एक केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। अराफात, जो अपने करिश्माई नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं, ने ‘पीएलओ’ को एक मामूली प्रतिरोध समूह से एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक इकाई में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो फिलिस्तीनी स्वायत्तता और राज्य का समर्थन करता है। यासिर अराफात की शान्ति के प्रति प्रतिबद्धता उनकी इज़रायल के साथ संवाद करने और हिंसा को रोकने के प्रयासों में स्पष्ट थी। आन्तरिक विरोध और विभिन्न गुटों से सन्देह का सामना करने के बावजूद, अराफात ने संघर्ष के शान्तिपूर्ण समाधान का समर्थन किया। उनके नेतृत्व को फिलिस्तीनी आन्दोलन की एकता बनाए रखने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में काम करने के सन्तुलन के रूप में देखा जाता है।
शान्ति की दिशा में यात्रा चुनौतियों और बाधाओं से भरी रही है। 1995 में इज़रायली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या, जो शान्ति प्रक्रिया में एक प्रमुख भागीदार थे, एक महत्वपूर्ण झटका था। इसके अतिरिक्त, अन्तिम समझौते तक पहुँचने में विफलता और ‘वेस्ट बैंक’ में इज़रायली बस्तियों का विस्तार प्रगति में अवरोध उत्पन्न करते रहे हैं। अराफात की विरासत एक जटिल इतिहास है, जो फिलिस्तीनी संघर्ष के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और स्थायी शान्ति प्राप्त करने में कठिनाइयों को दर्शाती है। 2004 में उनकी मृत्यु ने नेतृत्व में एक खालीपन पैदा किया, जिससे शान्ति प्रक्रिया को जारी रखना चुनौतीपूर्ण हो गया। हालाँकि, ‘पीएलओ’ और बाद में फिलिस्तीनी नेतृत्व ने ‘द्विराष्ट्र समाधान’ की दिशा में काम जारी रखा है, बावजूद इसके कि संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता बनी हुई है।
महात्मा गाँधी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धान्त इस संघर्ष में कारगर हो सकते हैं। स्थायी शान्ति की ओर इज़रायल और गाज़ा के बीच का संघर्ष जटिल और गहरा है, लेकिन महात्मा गाँधी के सिद्धान्त इस संघर्ष को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से, दोनों पक्ष एक-दूसरे की चिन्ताओं को समझ सकते हैं और स्थायी शान्ति के मार्ग पर चल सकते हैं।
इस संघर्ष के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का सहयोग भी आवश्यक है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ और अन्य वैश्विक संस्थानों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि न्याय और शान्ति की स्थापना हो सके। अन्ततः, यह महत्वपूर्ण है कि सभी पक्ष मिलकर संवाद और सहयोग के माध्यम से इस संघर्ष को समाप्त करें और एक नई, सकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर हों। (सप्रेस)