
पतित-पावनी, जीवन-दायिनी कही जाने वाली गंगा सरकार और ठेकेदारी में लगे सेठों की अकूत कमाई का साधन भी बन गईं हैं। पिछले कुछ दशकों से गंगा की सफाई के नाम पर लाखों करोड रूपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं और सेठों, सरकारी मुलाजिमों की तिजोरियां भरने के बावजूद गंगा जहां-की-तहां, मैली-की-मैली ही हैं। क्या है, यह गोरखधंधा?
गंगा करोड़ों लोगों की आस्था है। देश-विदेश में रहने वाले अनेक हिन्दुओं की जीवन में एक बार इच्छा रहती है कि वे गंगोत्री का साक्षात दर्शन करके गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाकर पुण्य कमा लें। ऐसे भी बहुत से बुजुर्ग हैं जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर गंगा के दर्शन के बाद मुक्ति की कामना करते हैं, लेकिन पर्यावरण में आ रहे बदलाव के बाद भागीरथी के रूप में गंगोत्री से आ रही गंगा की यह मुख्यधारा उद्गम से ही प्रदूषित हो रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी द्वारा ‘गंगा एक्शन प्लान’ और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘नमामि गंगे परियोजना’ में गंगा की निर्मलता के लिए पर्याप्त बजट, तकनीक, मानव-संसाधन आदि का उपयोग करने के बाद भी गंगोत्री में प्रतिदिन दस लाख लीटर क्षमता वाले सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से एकत्रित किए गए नमूने के आधार पर 100 एमएल पानी में ‘फीकल कॉलीफॉर्म’ का स्तर 540 पाया गया है। फीकल कॉलीफॉर्म का यह स्तर मनुष्यों और जानवरों के मल-मूत्र से निकलने वाले सूक्ष्म जीवों से होने वाले प्रदूषण को दर्शाता है।
‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ के अनुसार स्नान और आचमन करने योग्य जल की गुणवत्ता मानदंडों के अनुसार 100 एमएल पानी में फीकल कॉलीफॉर्म का लेवल 500 से कम होना चाहिए, लेकिन गंगोत्री में ही यह 540 पाया गया है, जो इंसान के लिए बहुत खतरनाक है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जल पीने लायक भी नहीं है। 5 नवंबर 2024 को ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे इसकी निगरानी करके 13 फरवरी 2025 तक रिपोर्ट प्रस्तुत करें जिसमें राज्य द्वारा उठाए गए कदमों का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए।
चिंताजनक है कि गंगा के उद्गम उत्तराखंड में ही देहरादून, उत्तरकाशी, पौड़ी, चमोली, हरिद्वार, टिहरी में लगाए गए लगभग 53 ‘सीवर ट्रीटमेंट प्लांट’ (एसटीपी) की क्षमता अभी इतनी कम है कि वे पूरी तरह गंगा में गिर रहे सीवर की सफाई नहीं कर पा रहे हैं। 25 सितंबर 2024 को ‘एनजीटी’ ने गंगा – यमुना में प्रदूषण पर उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी। उस दौरान भी कहा गया था कि गंगा का पानी आचमन करने योग्य नहीं है। उत्तरप्रदेश में भी ‘गंगा’ प्रदूषण की बीमारी से ग्रस्त है। जहां पर 22 अक्टूबर 2024 की रिपोर्ट में 326 नालों में से 247 नाले बिना शोधित है। जिसमें से 3513.16 एमएलडी सीवेज गंगा और सहायक नदियों में गिर रहा है।
6 नवंबर 2024 के आदेश में ‘एनजीटी’ के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि प्रयागराज जिले में सीवेज शोधन में 128 एमएलडी का अंतर है। इसके अलावा यहां के 25 नालों से गंगा में बिना शोधित सीवेज गिर रहा है और यमुना में भी 15 नालों से बिना शोधित सीवेज जा रहा है जिसके कारण मैदानी क्षेत्रों में कहीं भी गंगा जल की गुणवत्ता नहीं बची है।
गोमती नदी में रासायनिक प्रदूषकों के बढ़ने से भी मछलियों की मौत हो रही है। इसमें कम पानी होने के कारण अधिक प्रदूषणकारी तत्व गोमती में जमा हो गये हैं। यही हालात गंगा की सहायक काली, हिंडन, रामगंगा, तमसा, बेतवा, असी, वरुणा समेत डेढ़ दर्जन नदियों की भी है जहां ये नदियां पहले ही नाले का रूप ले चुकी हैं। उत्तरप्रदेश के 23 जिले जो गंगा के किनारे बसे हुए हैं, इनमें से 12 जिलों में तो पानी को साफ करने की सुविधा अभी तक मौजूद नहीं है, जबकि वाराणसी, फर्रुखाबाद, कानपुर, उन्नाव और मिर्जापुर जिलों से गंगा में आ रहे गंदे नालों की ताज़ा स्थिति उपलब्ध होनी बाकी है।
दिल्ली में यमुना की तरह गंगा के पानी में भी जगह-जगह सफेद झाग दिखाई दे रहे हैं। पटना में ऐसे ही 507 नाले चिन्हित किए गए हैं, जो बिना ट्रीटमेंट के ही गंगा में गिर रहे हैं। प्रत्यक्ष देखा जा रहा है कि यहां दीघा नहर का जहरीला रसायनयुक्त काला पानी बेधड़क गंगा में पहुंच रहा है जो मनुष्य और पशुओं की सेहत बिगाड़ रहा है। पेयजल के लिए इस्तेमाल हो रहे भूमिगत पानी में पहले से ही खतरनाक रसायन घुले हुये हैं। अभी कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर इसी पानी में 4-5 लाख लोगों ने स्नान किया है, जबकि यहां फीकल कॉलीफॉर्म नामक खतरनाक जीवाणुओं की संख्या मानक से कई गुना अधिक है।
जल वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध के अनुसार गंगाजल में ‘बैट्रींयोफोस’ नामक बैक्टीरिया पाया जाता है जो जल के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को खाता रहता है जिससे गंगाजल की शुद्धता अपने आप ही बनी रहती है, लेकिन अंधाधुंध प्रदूषण के कारण इस तरह के लाभदायक बैक्टीरिया भी उद्गम से ही समाप्त हो रहे हैं। पूर्व मंत्री उमा भारती के बाद ‘जल संसाधन मंत्रालय’ की कमान जब ‘सड़क एवं राजमार्ग मंत्री’ नितिन गडकरी को सौंपी गयी थी, उन्होंने 2017 तक गंगा को निर्मल करने का आश्वासन दिया था।
मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि गंगा की निर्मलता, अविरलता के लिए 2014 में निर्धारित 20 हजार करोड़ की राशि के अलावा अधिक आवश्यक होता कि सरकार और समाज मिलकर प्रदूषणकारी तत्वों को, जो पूरी तरह मानव-जनित हैं, विभिन्न संवादों और नियमों के आधार पर रोके जाते। इसके लिए गांव की जल एवं स्वच्छता समिति से लेकर राज्य और केंद्र के संबंधित मंत्रालय मिलकर प्रयास कर सकते थे।
गंगा की सफाई के नाम पर दो प्रयास अधिक प्रकाश में आए हैं जिसमें पहला स्नान घाटों की सफाई, जहां पर रंग-बिरंगे टाइल लगे हुए हैं। दूसरा ‘एसटीपी’ के सहारे गंगाजल की सफाई, जबकि बरसात में ‘एसटीपी’ ध्वस्त हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि गंदगी करने वाले अनियंत्रित पर्यटकों, उद्योगों, प्लास्टिक संस्कृति को मौका मिल रहा है कि वे अपने उपयोग के बाद पैदा होने वाली गंदगी और मानवीय मल-मूत्र को जहां भी विसर्जित करेंगे वहां जल-शोधन की प्रक्रिया से साफ हो जाएगा। ऐसा न करने से उन्हें कोई रोक भी नहीं रहा है जिसके परिणाम दिखाई दे रहे हैं। इसके चलते गंगाजल को प्रदूषण से मुक्ति कैसे मिलेगी? (सप्रेस)