वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 11,968 फीट की ऊंचाई पर बसा केदारनाथ मंदिर शीतकाल में 6 महीने बंद रहने के बाद अब 2 मई को फिर से खुलने वाला है। चारधाम यात्रा के इस हिस्से में लाखों श्रद्धालु आते हैं, लेकिन क्या हिमालय का यह भू-भाग इन तीर्थयात्रियों के लिए तैयार है? क्या वहां की भौगोलिक, पर्यावरणीय परिस्थितियां इस बोझ को झेल पा रही हैं?

घटना पिछले साल की है जब गौरीकुंड – केदारनाथ पैदल मार्ग पर, गौरीकुंड से लगभग तीन किलोमीटर आगे चीड़बासा क्षेत्र में पचास मीटर के दायरे में तीन अलग-अलग जगहों पर बोल्डर्स का मलवा गिरने से कई पैदल यात्री उनके नीचे आ गये थे। बचाव दल ने मलवे से तीन मृत व आठ घायल निकाले थे। तब इस मार्ग पर भीड़ का रात भर बेरोकटोक चलना होता था। कपाट खुलते ही इसी मार्ग से पहले सप्ताह में ही करीब डेढ लाख से ज्यादा श्रध्दालु केदारनाथ धाम पहुंचे थे। दुर्घटना के बाद ही चीरबासा, गौरीकुंड, लिचोली आदि जगहों पर लगातार गिरते पत्थरों से बढ़ते जोखिमों को देखते हुये उप जिलाधिकारी – उखीमठ ने भारी बारिश में केदारनाथ पैदल मार्ग पर रोक लगा दी थी। 

इसके कोई दस दिन बाद ही देर सायं जंगलचट्टी तथा भीमबली के पास बादल फटने से 16 किलोमीटर का मार्ग 29 जगहों पर क्षतिग्रस्त हुआ था। भीमबली पुलिस चौकी के पास पैदल मार्ग का लगभग 30 मीटर हिस्सा टूट गया था। बंद मार्ग पर महीने भर बाद ही आना-जाना शुरू हो सका था, परन्तु मार्ग सितम्बर आखिर तक रह-रह कर बंद होता और खुलता रहा। इस दौरान हादसे भी हुये। ज्यों ही प्रशासन या मुख्यमंत्री कहते थे कि सब कुछ ठीक हो गया है तभी कुछ ऐसा हो जाता था कि यात्रियों के लिये मार्ग को बंद करना पड़ता था। पैदल मार्ग को हुये नुकसान इतने व्यापक थे कि इसकी तुलना जून 2013 की भयंकर ‘केदारनाथ त्रासदी’ के नुकसानों से भी की गई थी।

कर्नल अजय कोठियाल जिन्होंने ‘नेहरू पर्वतारोहण संस्थान, उत्तरकाशी’ (नीम) के प्रधानाचार्य रहते हुये जून 2013 की आपदा के बाद के केदारनाथ के पुनर्निमाण व पैदल मार्ग को पुनः बनाने में प्रमुख विशेषज्ञ की भूमिका निभाई थी। जब वे मुख्यमंत्री के निर्देश पर क्षतिग्रस्त मार्ग पर स्वयं पैदल चलकर आंकलन करके लौटे तो उनका बयान था कि दूसरे चरण में केदारनाथ यात्रा निर्विघ्न चलेगी, किन्तु ऐसा हुआ नहीं। लगातार दो दिन की बारिश से हुये भूस्खलनों से मार्ग फिर बंद हो गया था। अभी भी पैदल मार्ग के जोखिम भरे स्थानों से गुजरने के लिये राहगीरों को प्रशिक्षित तैनात कर्मियों की मदद दी जा रही है।

जब यात्रा दूसरे चरण में थी और तीन-चार हजार यात्री पैदल जाने लगे थे, तो अचानक  चीरबासा क्षेत्र में 15 मीटर सड़क वाश के कारण केदारनाथ पैदल मार्ग पर यात्रा रोक दी गई थी। फंसे यात्रियों को वैकल्पिक रास्ता बनाकर निकालना पड़ा था, किन्तु घोड़े, खच्चर फिर भी रूके रहे थे। इसी मार्ग पर एक बहुचर्चित दुर्घटना हुई थी जिसमें गौरीकुंड डाट पुलिया के पास ऊपर से तेज बरसाती पानी फ्लैश-फ्लड के बाद नाले में आया और तीन दुकानें मलवे के साथ बहा ले गया। केदारनाथ से पंद्रह किलोमीटर पहले तीन लोग मर गये थे, एक दर्जन से ज्यादा लापता हो गये थे औैर यात्रा रोक दी गई थी।

केदारनाथ मार्ग को हर समय खुला रखने के उपक्रम में इतनी असफलतायें व अनिश्चिततायें इसलिये भी आ रही हैं क्योंकि यहां बहुत ही बड़े पैमाने पर जगह-जगह ढलाव अस्थिरीकरण गतिमान है। यह अस्थिरता जगह-जगह नये सिरे से मार्ग निर्माण की मजबूरी के अलावा पेड़-झाड़ियों की जड़ों से ढहने, उन पर टिके पत्थर बोल्डरों के लुड़कने से भी हो रही है। भारी बरसात में जब अत्यधिक भूक्षरण होकर मलवा बहता है तो कई मामलों में शिलाखंडों के आधार व उनको बांधे रखने वाली मिट्टी भी खिसक जाती है। इससे ढलावों से बोल्डरों का गिरना शुरू हो जाता है। एक शिलाखंड हटा तो उसके साथ लगे कई ढहने की स्थिति में आ जाते हैं।

जून 2013 की ‘केदारनाथ आपदा’ के बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों में पता चला था कि भारी बरसातों में अन्य स्थानों की अपेक्षा गौरीकुंड-केदारनाथ-पुरी के पैदल मार्ग में ज्यादा भूस्खलन हुये थे। पैदल मार्ग का मुख्य पड़ाव रामबाड़ा का तो अस्तित्व ही नहीं रहा था।

सरकारी प्रक्रियाओं में यह मान भी लिया जाये कि जब हर साल लाखों यात्री इसी मार्ग से चल रहे हैं तो यह मार्ग निरापद ही है, किन्तु जलवायु परिवर्तन के इस दौर में यह सोचना ठीक नहीं होगा। केदारपुरी जाते वक्त लिनचौली से बहुत चढ़ाई है। इसलिये इस मार्ग पर केदारनाथ की ओर से सदैव ही अति-वृष्टियों या हिमनदीय बहावों में भारी जलराशि का बहाव तेज गति का होगा। इससे मार्ग में कटावों, ढहावों और भूस्खलनों की घटनायें बढ़ेंगी ही। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी उच्च क्षेत्र में बादल विस्फोटों और हिमस्खलनों की बड़ी समस्या होने जा रही है। ‘केदार आपदा’ में चंद सेकेण्डों में ही रामबाड़ा में बाढ़ मकान, आदमी, वाहनों,  जानवरों को बहा ले गई थी।

इस बेहद संवेदनशील मार्ग को बहुत सहेज कर रखना होगा व केदारनाथ घाटी में मुख्य मार्ग से ज्यादा इसकी देखभाल करनी होगी। ‘एनडीएम’ की वार्षिक रिपोर्ट में महत्वपूर्ण सुझाव था कि संवेदनशील इलाकों में ‘स्लोप स्टैबलाइजेशन’ का काम किया जाए जिसकी वैज्ञानिक तकनीकें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध हैं। वैज्ञानिक तरीकों से नये मार्गों का निर्माण व पुनरोद्धार किया जाये। भूविज्ञान के हिसाब से केदारनाथ मार्ग पर भूस्खलन के जोखिम सदैव बने रहेंगे। यहां ‘एमसीटी’ जोड़ व पहाड़ों की तीखी ढलान है, कहीं-कहीं हिमनदों में आया मलवा ‘ग्लेशियल डिपॉजिट’ का है। जाहिर है, पुराने भूस्खलन पुनः सक्रिय हो रहे हैं व नये नये भूस्खलन क्षेत्र बन रहे हैं। ताजे भूस्खलनों व ‘जेसीबी’ आदि से मलवा हटाने के दौरान ढलावों की कटाई-छंटाई से आसपास के स्थिर ढाल भी अस्थिर हो जाते हैं। मार्ग रह-रह कर खुलते, बंद होते रहते हैं। बरसातों में ढह के आये बड़े-बड़े शिलाखण्डों को विस्फोटों से तोड़ना भी होता है। इस समय यह केदारनाथ तक पहुंचने के राजमार्ग और गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग पर हो रहा है। जब सैकड़ों यात्री अवरूध्द मार्गों पर रूके हों तो काम लम्बित रह जाते हैं। तात्कालिक रूप से भी मशीनी ठोक-पीट के विकल्प भी नहीं देखे जाते। ‘रिटेनिंग वाल’ व पुस्तों को साथ-ही-साथ करने का तो सोचा ही नहीं जा सकता। इन हिस्सों में रूके रहना भी खतरनाक हो जाता है। मलवे में दबकर जान-माल की हानियां हो जाती हैं, परन्तु जब यात्रा-सीजन खत्म हो जाये तब ही छूटे काम किये जाने चाहिये। (सप्रेस)